कूफा के उन बदनसीब लोगों के नाम

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ऐ कूफा के बदनसीब लोगो !
हज़रत इमाम हुसैन के हम-असरो !
वक्त के गहरे बेकराँ समंदर में
इतिहास के बे-लिहाज मछेरे के
जाल में फंसे हुए तुम लोग,
युगों-युगों से तड़प रहे हो,
युगों-युगो तक तड़पते रहोगे !
निजात तुम्हें न मिल सकेगी,
मौत को भी यूं ही तरसते रहोगे सदियों तक !
वक्त के गहरे, बे कराँ समंदर में !

अपनी औलादों गी हकारत-भरी नज़रें
निश्तर की तरह चुभती रहेंगी तुम्हारे सीनों में,
कूफा के मासूम लोगों की बद-दुआएं
झुलसाती रहेंगी तुम्हारी बे-वफाइयों को,
क्यों के
तुम्हीं ने उसे आने की दावतें दी थीं,
तुम्हीं ने त्रिखे थे वो दर्जनों ख़त-
जिनमें लिखा था तुम ने-
के यहाँ अब फल पक गए हैं-
ज़मीन हरी-भसे हो गई है,
नहरें उबल पड़ी हैं।
आप आएंगे तो अपने-आप को यहां
अपने अकीदतमंद सिपाहियों के लश्कर में पाएंगे।
तुम्हीं ने तो भेजे थे उसको,
इसरार भरे ख़त इतने !
ताके, अगर तुम किन्हीं मसहलतों के ज़ेरे असर
अपनी बात से फिर जाओ,
हक़िकत से मोड़ लो आँखें
तो तुम्हारे उन बुज़दिल ज़मीरों को
उन ख़तों का दिखा सके दर्पण।
लेकिन तुम तो बातिल के हाथों
बेच बैठे थे ज़मीर अपने
ऐ कूफा के बद-बख्त लोगो !
वक्त के खारे समंदर में
इतिहास के मछेरे के जाल में फंस कर
तुम न जाने कब तक तड़पते रहोगे यूँ ही।
इतिहास का मछेरा तुम्हें
अपने इस जाल से छूटने नहीं देगा,
और वक़्त के समंदर का यह खारा पानी
तुम्हें मरने नहीं देगा।
क्योंकि तुमने
ईमान की गर्दन लहुलुहान की है,
सच से बे-वफाई की है
जन्नत के सदा-बहार फूलों का
घोड़ों के सुमों के नीचे रौंधा है तुमने।
ऐ कूफा के बद-नसीब राहबरो राहज़नो।