मूल : भर्तृहरि · डोगरी पद्यानुवाद : रामनाथ शास्त्री* लगभग १४ बरे होए, ए पद्य-अनुवाद पहले बारी छपेआ हा। डोगरी भाशा ते संस्कृति दे जीवनै च पिछले २५ बरें दी साधना दी ए कहानी बड़ी गं रोमांचकारी ऐ। डोगरी, डोगरें दी धरत ते डुग्गर-नवासी ए त्रैवै भांगवान न जे इनें इस चाली दी साधना गी परवान चढ़दे दिक्खेआ ऐ ।
डोगरी पोथियें दे दुए संस्करण बी होंगन, ए गल्ल अज्जै कोला १०- ५ बरे पहले कुन सोची सकदा हा ? कुन सोची सकदा ही जे करें डोगरी भाशा बी इस जोग होई सकग जे श्रोदे च रियास्ती यूनिवरसिटी दियां (O. T) परीक्षां चालू होई जांगन ? कुन सोची सकदा हा जे १६६६ ई० तगर पुजदे पुजदे इनें परीक्षाएं च शामल होने आलें दी गिनतरी दुइयें सबनें भाशाएं दे सांझे जोड़ा कोला बी उप्पर चली जाग । (१६६६ ई० च डोगरी परीक्षां देने आलें दी गिनतरी ६५० दे लगभग ऐ) ।
डोगरी गी अपने घरै च इन्ना सारा थार थोश्रा ऐ, इन्ना सारा मान थोग्रा ऐ, एदे च चबात लाने आली कोई गल्ल नई । होश्रा सिर्फ इन्ना ऐ जे जड़े मूढ़ लोक डोगरी गी 'पच्छड़ी दी बोली' आखी आखी, एदे पर घृणा कन्ने हसदे हे, ओ अज्ज एदी उन्नति गी दिक्खियै दन्दे हेठ औंगलियां दबाई लैन्दे न ।
इस अनुवादै च में सिर्फ कुर्त-कुतै शब्दें दे हिज्जे (Spelling) बदले न, बाकी सब किज पहला गै । जम्मू, मई १६६६ - रामनाथ शास्त्री पहले संस्करणै च मंगल कामना महाकवि भर्तृहरि के तीनों शतकों का मूल संस्कृत, साथ में हिन्दी गद्यानुवाद और नीचे डोगरी भाषा में पद्यानुवाद का यह श्री रामनाथ शास्त्री का प्रयत्न बड़ा स्तुत्य है। उससे दो तीन लाभ हैं। एक तो डोगरी की सहज सरल भाषा में आकर ये नीति-शतक के श्लोक जो कि मुझे मुद्रित रूप में पढ़ने को मिले हैं जन-साधारण तक आसानी से पहुँच सकते हैं, और पद्मरूप में होने पर वे सहज कंठस्थ किये जा सकते हैं। दूसरे संस्कृत, हिन्दी, डोगरी में जो समानता है वह भी इन अनुवादों से स्पष्ट हो जाती हैं। कई तत्सम शब्द सदियों से छन छन कर हमारी बोलियों तक पहुंच गये हैं, जैसे प्रीत. सागर, कामधेनु, चातक, चकोर, कला कलह, शांत, तेज, रूप, नाग, संतान, फल, लालसा, कृपन, बुद्धि, विद्या राजनीति, हिंसा, लोभी, दया, श्राज्ञाकारी, विपदा, यौवन इत्यादि । तद्भवों की भी कमी नहीं है । फर्क सिर्फ थोड़ा सा मुहावरे का पड़ता है। परन्तु बोली का धर्म यह है कि ठडी छापे की स्याही में उसे पढ़ो और उसे गर्मागर्म उच्छ्वसित रूप में सुनो, दूसरे रूप में वह अधिक समझ में आती है ।
कुछ महीने पहले, नई दिल्ली में, एक डोगरी कवि सम्मेजन सुनने का मुझे मौका मिला। वहां जो कुछ हो रहा था उसका आधे से अधिक मेरी समझ में आ गया। इसके पहले 'गुत्तलू' और 'नमीं चेतना' मैं पढ़ चुका था। इस बोली के बोलने वाले डोगरे हैं । ये बहादुर और साहसी लोग हैं। इन में हिन्दी के साथ-साथ संस्कृत के ग्रन्थों के प्रति भी प्रेम बढ़ रहा है। यह भगवद्गीता के अनुवाद और इस अनुबाद से स्पष्ट है ।
सुभाषितकारों में भर्तृहरि का स्थान बहुत ऊंचा है । यद्यपि विद्वानों में उसके काल और उसकी रचनाओं के विषय में खासा मत-भेद है यहां तक कि कुछ लोग नीतिशतक का लेखक और मानते हैं, वैराग्यशतक का और और भोजप्रबध रचने वाला कवि और ही मानते हैं। फिर भी एक बात निश्चित है कि इन शतकों की लोक-प्रियता संस्कृत काल से आज तक अक्षय बनी रही है । और वह जनता की जबान पर बैठे हुए कई सूत्रों और सूक्तियों से स्पष्ट है ।
कैसे एक ही मत्तीषी को संसार की इन आसक्तियों में इतना गाढ़ा रस पैदा हुआ कि एक दिन विरक्ति के प्रति भी उतनी ही जबर्दस्त आसक्ति उन में पैदा हुई, यह वैसे ऊपरी ऊपरी देखने वालों के लिए चाहे बड़ी परस्पर विरोधी सी बात लगे पर आधुनिक मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में इन दो बातों में बहुत गहरा सबंध है । अति पीने वाला ही तौवा करता है, अति विलासी ही सन्यासी बनता है । भौतिक सुख की अति ही आध्यात्मिक सुख की ओर खीच ले जाती है। अनासक्ति की यही कारण-मीमासा है। मैथ्यू आरनल्ड ने इसीलिए कहा था-'इटर्नल पैशन ! इटर्नल पेन !!'
अब यह सर्वसाधारणतयः माना जाने लगा है कि कविता का काम उपदेश देना नहीं है। उसमें उपदेश अगर हो भी तो जैसे दूध में चीनी घुल जाती है ऐसा हो । 'कान्ता सम्मिततयोपदेशयुजे !" परन्तु इन कविताओं को उस काल के परिपार्श्व में देखना चाहिये ।
हो सकता है कि भर्तृहरि आज होते तो शायद वैसी रचना न लिखते । मगर उससे उस नीति-परक काव्य की सूत्र-शैली की महत्ता कम नहीं हो जाती । नीति और शृंगार परक शतकों की पूरी परम्परा हमें बाद में मिलती है । गाथा सप्तशती के बाद तुलसी, रहीम. वृंद और बिहारी तक । 'सतसैया के दाहरे ज्यों नावक के तीर । देखने में छोटे लगें घाव करें गंभीर ।' यह इन्ही छोटी-छोटी प्रभावकारी रचनाओं के लिए कहा गया था। डोगरी अनुवादों में कुछ खालकर समझाने की भी प्रवृत्ति रही है इसलिए यत्र-तत्र मूल से वे कुछ लम्बे हो गये हैं । भर्तृहरि कौन थे ? राजा थे या संत ? उज्जयिनी में ही थे या धार में ? शतकत्रयी का कर्ता एक था, या अनेक-यह सब समस्याएं इतिहासकार को गोरखधधे में डालती रहेंगी। पर जो काव्य भर्तृहरि के नामपर बचा हुआ है वह सदा आकर्षित करता रहेगा । उसकी मामिकता अतुलनीय है। भारत की अन्य भाषाओं में ऐसे समश्लोकी और पद्यबद्ध अनुवाद बहुत पहले हो चुके हैं। मराठी में पचास बर्ष पूर्व भर्तृहरि का पद्यानुवाद उपलब्ध है। मैं लेखक को पुनः बधाई देता हूं कि डोगरी भाषा में भी उसने इस ग्रन्थ को उपस्थित किया अखंड, दृढ़ सबंध में एक और इस प्रकार भारत और काश्मीर के सांस्कृतिक कड़ी और जोड़ दी । नई दिल्ली १५-१०-५५ – प्रभाकर माचवे . (पहले संस्करण का) आत्मा-निवेदन संस्कृत के लोक-प्रिय कवि भर्तृहरि के, नीतिशतक के डोगरी पद्यानुवाद के रूप में यह छोटो सी भेंट प्रस्तुत करते हुए मुझे किसी भी तरह की झिझक या हीन भावना नहीं है। इसके विपरीत मेरे मन में एक सरल प्रसन्नता भरी हुई है। भारत में स्वतन्त्र जनयुग के इस उषाकाल में ही भारत की विभिन्न जन-भाषाओं में जो नई चेतना पैदा हुई है, डोगरा-पहाड़ी जाति की मातृभाषा डोगरी उससे अछूती नहीं रही । मातृभाषाओं की इस नई चेतना ने ही आज जगह जगह उपेक्षा की धूल में पड़ी अनेक प्रतिभाओं को जगने का अवसर दिया है। जम्मू प्रान्त में डोगरों की संस्कृति तथा कला के पुनर्जागरण की प्रतीक 'डोगरी संस्था' उसी जागरण का फल है। संस्था की स्थापना आज से लगभग १२ बर्ष पहले हुई थी । डोगरी संस्था जम्मू ने डोगरा-पहाड़ी जाति की संस्कृति को नए युग के प्रकाश में सम्हालने-सम्वारने के लिये इन बर्षों में जो साधना की है उस से जनता भली प्रकार परिचित है। भर्तृहरि के काव्य का यह पहला डोगरी पद्या-नुवाद भी उसी प्रयत्न की एक कड़ी है। हमारे मन में भारत की किसी भी दूसरी भाषा की प्रगति से होड़ करने की दुर्भावना नहीं है। भारत की अनेक समृद्ध भाषाएं डोगरी से युगों आगे हैं । हम केवल अपनी इस नवीन साहित्यिक प्रगति की कोमल पगडंडी को दूसरी भाषाओं के प्रशस्त राजपथों के साथ साथ आगे ले जाने का प्रयत्न कर रहे हैं। राजपथों के होते हुए भी इन पगडंडियों की जरूरत और महत्व के विषय में आज कोई भी उदार व्यक्ति विरोधी विचार नहीं रख सकता । यही पगडंडियां कल राजपथ बनेंगी । डोगरी साहित्यिकों की रचनाएं इस पगडंडी पर सदा प्रकाशित रहने वाले दीषक बन कर आलोक देने लगीं हैं। श्राज जन-भावना इस पथ पर चल कर जिस प्रकार नवयुग की नई चेतना के रमणीय प्रदेशों की ओर बढ़ रही है उसे देख कर हमें अपनी साधना पर सच्चा गौरव होता है । मेरे इस पद्यानुवाद में यदि कुछ रस और सौन्दर्य बन पाया है तो वह भर्तृहरि के ही काव्य की देन है। त्रुटियां तथा दोष सभी मेरे हैं। डोगरी भाषा की सामर्थ्य तो अपूर्व है लेकिन हम ही अभी उस सामर्थ्य का पूरा उपयोग करने के योग्य नहीं हुए हैं। यह काम हमारी अगली पीड़ी के लेखक पूरा कर सकेंगे । डोगरी साहित्य की यह नवचेतना मूलतः भारतीय साहित्य की ही समृद्धि की सूचक है। वैसे भाषा-विज्ञान की दृष्टि से भी डोगरी भारतीय परिवार की भाषाओं की सगोत्र है । भारत की उत्तरी सीमाओं के संस्थापक और रक्षक डोगरों की मातृभाषा होने के कारण यह अपना अलग महत्व भी रखती है ।
विजय दशमी - रामनाथ शास्त्री ॐ मंगलम्
दिक्कालाद्यनर्वाच्छन्नानन्त-चिन्मात्र मूर्तये ।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ।।१।।
उस शान्त तेज युक्त परम शक्ति को प्रणाम जो समय और स्थान के बन्धनों से दूर है, ओ अनन्त चेतना की मूति है तथा जिसे केवल अपनी अनुभूति से ही जानना संभव है।
(१)
दिसें आले पिञ्जरे च जड़ा नइयों बज्जा दा,
समे दे नशानें कोला परें, दूर, पार ऐ ।
चेतना दा सुम्ब, जिसी आतमा पंछानी लै,
शान्त, तेजरूप ओदा, उसी नमस्कार ऐ ॥
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता।
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्य-सक्तः ॥
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या ।
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ।।२।।
मैं जिस (पिंगला) की चिन्ता में सदा हुबा रहता हूँ-वह मुझ से विरक्त है; वह जिस अन्य पुरुष से स्नेह करती है वह पुरुष किसी दूसरी रमणी (वैश्या) से प्रेम करता है। वह वैश्या मेरे प्रेम में मग्न है। उस (पिंगला) को, उस कामी पुरुष को, कामदेवता को, उस वैश्या को ओर मुझे, सब को धिक्कार है।
(२)
मेरे दिन-रात जेदी हीखिया च रंगेदे,
ओदी दुनिया च मिगी नैंह भर थार नई ।
ओ जेदी प्रीता दियां पान्दी रखै औंसियां,
उसी ओदे कन्ने कुतै बिन्द बी प्यार नई ।
ओ छैला जिदा बिना मुल्ला दा गलाम ऐ,
ओदें ओठें पर अट्ठ पैहर मेरा नाम ऐ ।
सौ फटकार कामदेवत. दे धन्धेगी,
उसी, इसी, भिगी कन्ने भोले उस बन्देगी ।।
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मय-दूषिताः ।
अबोधोपहताश्चान्ये, जीर्णमंगे सुभाषितम् ।।३।।
विद्वान् लोग आपस की ईर्ष्या में बन्धे हैं, धनवान् अभिमान से मैले हैं। बाकी साधारण जन अज्ञान के बन्दी हैं। कवियों की वाणी, इसी कारण, दुखी रहती है।
(३)
कला दे पुजारियें गी, 'कलह' खाई गेई ऐ,
धना आले दिक्खे सदा मान्ना बिच कुड़ादे ।
दुखिये न मूड़ बाकी, दुनिया दे मानु सब,
कवियें दे बोल तद्द मनोमन चुड़ा दे ।।
अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
• ज्ञान-लव दुविदग्धं ब्रह्मापि च तं नरं न रञ्जयति ।।४।।
मूर्ख को खुश करना आसान है, विद्वानों को प्रसन्न करना उससे भी आसान है। लेकिन ज्ञान की बून्द मात्र से घमण्ड करने वाले को ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकता ।
प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्र - दंष्ट्रान्तरात् समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदूमिमालाकुलम् ।
भुजङ्गममपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत् न तु प्रतिनिविष्ट-मूर्ख-जन-चित्तमाराधयेत् ।।५।।
मगरमच्छ के दान्तों में से बलपूर्वक मणि निकाल लेना सरल है; ऊंची २ लहरों से लहराते सागर को भी शायद तरा जा सकता है; क्रोध में आए सांप को भी शायद कोई पुष्पमाला की तरह धारण कर ले पर जिद्द पर अड़े हुए मूर्ख मनुष्य के चित्त को रिझाना संभव नहीं । (५) मच्छे दियें दाड़ें बिच फसेदे जो मोती मु ंगे, कुशवा ओ कड्डि कोई गोदै बिच भरी है । न्हेरी च तफानें आले सागरा दी लैहरें पर, (४) जोरा आला कोई जना आर-पार तरी लै । मूरखें दा मन परचाना, कोई औखा नई, पढ़े दे स्यानेंगी मनाना, कोई औखा नई । बिस्सला ओ नाग जिसी गुस्से दे मरोड़ पौन, फुल्लें आंगू कुशवा कोई सिरै पर धरी है। दौनें दै मंझाटै जड़े मूरख-स्याने न, उनेंगी मनाना ब्रह्मा गितै बी ते सौखा नई ।। जिद्दी पर आएदा ऐ मन जिस मूरखा दा, लबदा निं मानु जड़ा उसी बस्स करी लै ।।
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन् पिवेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासादितः ।
कदाचिदपि पर्यटञ्छश - विषाणमासादयेत् न तु प्रतिनिविष्ट - मूर्ख - जन-चित्तमाराधयेत् ।।६।।
यत्न से यदि दबाया जाय तो शायद रेत से भी तेल प्राप्त हो सके; प्यासे को शायद मृग मरीचिका (जलहीन चमकीली रेत) में भी जल मिल सके; घूमते हुए शायद कहीं खरगोश का सींग भी मिल जाए, लेकिन जिद्द पर अड़े हुए मूर्ख के चित्त को प्रसन्न करना सम्भव नहीं । (६) अकली दे कोल्हू विच रेत मुट्ठ पाओ तुस, ढंगा नै चलाओ मत, तेल बिन्द थोई जा । मृग-तृष्णा दे झूठे लारे-लश्कारें बिच, थोन लगे कुशवा तां पानी कुतै थोई जा । तुप्पन चढ़ेदे दिक्खो, जाड़ें-पचवाड़ें मत, कुते खरगोशा आला, सिंग इक थोई जा । जिद्दा आले किल्ले कन्ने, बज्जे दे न यार जड़े, उनेई मनाने आला, "जाड़ा विच रोई जा" ।।
व्यालं बालमृणाल-तन्तुभिरसो रोङ्ख समुज्जृम्भते, भेत्तुं बज्रर्माण शिरीषकुसुम- प्रान्तेन सन्नहह्यति ।
माधुर्य मधुविन्दुना रचयितु क्षाराम्बुधेरीहते, मूर्खान्यः प्रतिनेतुमिच्छति व ात् सूक्तैः सुधास्यन्दिभिः ॥७॥
कोमल कमल की तारों से वह सांप को बान्धने का यत्न करता है; शिरीष पुष्प के किनारे से वह हीरे को काटने की इच्छा करता है; शहद की एक बून्द से वह सागर को मीठा करना चाहता है जो मनुष्य, अमृत जैसे मीठे बचनों से मूर्खा को खुश करने की इच्छा करता है । (७) नन्दड़ दी तारें कन्ने, अक्खियें दे शारें कन्ने बिंम्बले दे नाग काले, बस करी लैग । स्रीं आले फुल्लें दियें तारें दी कटारें कन्ने, हीरेंगी ओ छिल्लने दा जस करी लैग । तोला भर गुड़ा कन्ने, सागरा दा जल खारा, पीने जोग, अति मिट्ठा रस करी लेग । मिट्टी मिट्टी गल्लें कन्ने, अकली दे बैरियेंगी, खुश कर लैग जड़ा, बस करी लैग ।। .
स्वायत्तमेकान्तहितं विधात्रा छादनमज्ञतायाः ।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विनिर्मितं भूषणं मौनमपण्डितानाम् ।।८।।
विधाता ने मूर्षों की मूर्खता पर परदा डालने बाला, और उनके अपने वश में रहने वाला, खास तौर पर विद्वानों की सभा में उनका हित करने वाला, 'मौन' (खामोशी) रूपी सुन्दर गहना बनाया है।
(८)
मूरखें दी जड़ता दे दागें गी छपानै गितै,
लक्खें नुसखें दा इक नुसखा ए 'मौन' ऐ ।
चतर सथाने जित्थें, अकली दी गल्ल लान,
मूरखें दी इज्जत (१) बचाने बाला कौन ऐ (?)
ε
यदा किश्चिज्ज्ञो ऽह गज इब मदान्धः समभवम्, तदा सर्वज्ञो ऽस्मीत्यभवदवलिप्त मम मनः ।
यदा किञ्चित्किश्विद् बुधजन सकाशादधिगतम्, तदा मूर्वो ऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ।।६।।
जब मुझे थोड़ा सा ज्ञान प्राप्त हुआ तो मैं हाथी के समान मदमत्त हो गया । मुझे तब, यही घमड था कि मैं ही सब कुछ जानने वाला हूँ। परन्तु अब विद्वानों के पास बैठ कर उन से कुछ सीखने का मौका मिला तो मालूम हुआ कि मैं तो मूर्ख हैं। बुखार की तरह मेरा घमण्ड दूर हो गया ।
)ع( गल्लां दो सिक्खी सिर जदू' फिरी गेआ हा, मेरी चाल हाथियें दी टोरा कोला भारी ही । जानीजान विद्दवान होने दा हा दम मिगी, पृथ्थिया च इक मेरी 'काठा दी कटारी' ही । बल्लें बल्लें बिद्या दे दीपकें दी जोत दिक्खी, चातर सयानें कन्ने लग्गी जदू यारी ही । मूड़ता दा ताप मेरा चुपचाप गेआ उठी, जेदे कन्ने आत्मा दी होश गेदी मारी ही ।।
कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धि जुगुप्सितं निरुपमरसप्रीत्या खादन्खरास्थि निरामिषम् ।
सुरपतिमपि श्वा पाइर्वस्थं विलोक्य न शंकते, महि गणयति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रह-फल्गुताम् ।।१०।।
कीड़ों से भरी हुई, मुख की लालाओं से गीली, दुर्गन्ध-युक्त, घृणा पैदा करने वाली, बिना मांस की हड्डी को अपूर्व रस ले ले कर खाता हुआ कुत्ता (उस समय) पास खड़े हुए इन्द्र की भी परवाह नहीं करता । नीच लोग इसी तरह (अन्धे होकर) मिली हुई वस्तु के दोषों को नहीं देखते ।
(१०)
सुक्केदा ऐ, सड़ेदा ऐ हड्ड कुसै डंगरा दा,
किरमें भरोचा, दुरगन्ध नक्क खाई जा ।
कुत्ता, पर दिक्खो, किन्ने रसा कन्ने चापैदा,
अक्ख नेइयों पुट्ट, करें इन्दर बी आई जा ।
अन्ने, उच्छे चित्ता दिया लालसा गी दिक्खो बिन्द,
दोस नइयों बुज्जै, अवखीं मीटियै चबाई जा ।।
शिरः शावं स्वर्गात्पशुपति-शिरस्तः क्षितिधरं महीध्र। दुत्तुङ्गा दवनी मवनेश्चापि जलधिम् ।
अधो गंगा सेयं पदमुपगता स्तोकमर्थवा विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ।।११।।
गंगा स्त्रा से शिवजी की जटाओं में, वहां से हिमालय पर, ऊचे हिमालय से पृथ्वी पर और पृथ्वी से सागर में जा गिरी । इस तरह गंगा नीचे ही नीचे गिरती गई और कम होती गई । (इसी तरह) जो पुरुष बुद्धि के मार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं, उन का भी बहुमुखी पतन होता है ।
(११)
अकली दी पैड़ियें चा खुञ्जी जा मानु कदें,
खिन्नु आंगू खल्लो खल्ल पौन्दा तरटोए दा ।
सुरगा दी बासन, इस गंगा गी गै दिक्खी लौ,
शिवजी दो जटें आई, उत्थों उच्चे किंगरें,
किंगरे 'शा पुजा, उत्थों सागर दी गोदा पेई,
टौना-तरटोना पेआ, कन्ने लिस्सी होई गेई ।।
शक्यो वारयितु जलेन हुतभुक् शूरेंण सूर्यातपो, नागेन्द्रो निशिताकु शेन समदो, दण्डेन गौर्गर्द भौ ।
व्याधिर्भेषज - संग्रहैश्च विविधैर्मन्त्र प्रयोगैविषम् सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहित मूर्खस्य नास्त्यौषधम् ।।१२।।
पानी से आग बुझाई जा सकती है, छाते से धूप को रोका जा सकता है। मस्त हाथी अंकुश से काबू में आ जाते हैं, डंडे से बेल और गधा । बीमारी दवाइयों से तथा विविध मंत्रों से विष दूर हो जाते हैं। शास्त्र में सब के लिए दबाई लिखी है, लेकिन मूर्खता की कोई दवा नहीं । (१२) अग्ग स्हालने गी इत्थें पानी हथ्यार ऐ, धुप्पा थर्मा बचाने गी छत्तड़ी तेयार ऐ । हाथी गी डराने गितै ओंकस बनाए दा, घोड़ा, बल्द डण्डै सोटे रोहन्दा ऐ डराए दा । रोगें आले पहाड़ें गिते औखद बरूद ऐ, बिस-मौरा ढाने आला मैन्तर मजूद ऐ। कारी हर रोगै दी ऐ पोथियें लखोई दी, मूरखें दा रोग फी असाध की गनोआ ऐ ?
साहित्य - सगीत - कला - विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ।
तृण न खादन्नपि जीवमान- स्तद् भागधेयं परमं पशुन। म् ।।१३।।
जो मनुष्य साहित्य, सगीत तथा कला (के प्रेम) से रहित है उसे पूछ और सींगों से रहित पशु ही जानो। यह दूसरे पशुओं का सौभाग्य है कि ऐसा नर-पशु जीने के लिये घास नहीं खाता । (अन्यथा पशुओं के लिए घास भी दुर्लभ हो जाती) (१३) विद्या ते कला कन्ने जेदी पनशान नई, गीत सुनी आखै 'कोई इन्ना कैसी रोआ दा', पूशला ते सिंगें बिना पसु उसी जानो तुस, मानुएं दा रूप उसी टपले 'नै थोआ दा । पशुयें दे भाग चंगे, घा नइयों खन्दा ए, ए बी करें खन्दा, घा चटम हुन्दा होआदा ।।
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुवि भार-भूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।१४।।
बरं पर्वत-दुर्गेषु भ्रान्तं बनचरैः सह ।
न मूर्खजन-सम्पर्कः सुरेन्द्र-भवनेष्वपि ।।१५।।
जिनके पास न विद्या है, न तपस्या है. न दान है; ज्ञान, शील, (कोई और) गुण तथा धर्म भी नहीं है. वे धरती की छात्ती पर बोझ के समान हैं और मनुष्य के भेस में घूमने फिरने वाले पशु हैं। जंगली (असभ्य-मूढ़) मनुष्यों के साथ दुर्गम, भयंकर जगलों में निवास करना अच्छा है, लेकिन मूखों के साथ इन्द्र के महलों में भी रहना बुरा है। (१५) (१४) जंगली मनुक्खें कन्ने, जे मानु च विद्या दा तप-बल निं होऐ, धरम-सील होए, नां गुण-ज्ञान होऐ । जंगलें दा बास चंगा । इन्दरा दे महलें बिच, उसी मानु आखो तां आखो बी कियां, तां मानु ते पशुएं च फी के फरक ऐ ? मूरखें दा साथ मंदा ।।
शास्त्रोपस्कृतशब्द-सुन्दर-गिरः शिष्यप्रदेयागमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभोनिर्धनाः ।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य सुधियस्त्वर्थं विनापीश्वराः, कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षकैर्न मणयो यैरर्घतः पातिताः ।।१६।॥
जिस राजा के राज्य में शास्त्रों के जानकार, मधुर भाषी, विद्या दान देने वाले, प्रसिद्ध कवि निर्धन होकर रहते हैं उसमें उस राजा की ही जड़ता है। विद्वान् तो धन के विना भी समर्थ होते हैं । मूर्ख यदि हीरे को बुरी जगह भी रख दे तो क्या उससे हीरे का असली मूल्य कम हो जाता है ?
(१६)
पढ़े-लिखे दे कविजन गुनिये, अमरत-बानी दे स्वामी
जिस राजा दी नगरी अन्दर दुखिया जीन बितान्दे न ।
ओ ते मूरख राजा दी गै बदनामी दा मूजब ऐ,
बिना धनें बी बिद्या आले मानी मान गै पान्दे न ।
मूरख मानु नासमझी नै हीरें गी पनशानै नई'
सुच्चे हीरे तां बी साथी पूरा मुल्ल पोआन्दे न ।।
हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा- प्यथिभ्यः प्रतिपद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धि पराम् ।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्य मन्तर्धनम्, येषां तान्प्रति मानमुञ्झत नृपाः ! कस्तैः सह स्पर्धते ।।१७॥
चोर जिसे देख नहीं सकता, जो हर समय एक अपूर्व शान्ति को बढ़ाती है, (विद्या के) अर्थियों को देने पर जो दिन रात बढ़ता है तथा प्रलय के समय भी जिस का नाश नहीं होता । ऐसा, विद्या-रूपी धन जिन के पास है, ऐ राजाओ, उनके साथ घमण्ड करना छोड़ दो। उन का मुकाबला कौन कर सकता है ।
(१७)
चोरी ते डाके दा इसगी निं डर ऐ,
अमने दी ठण्डी फुहारें दा घर ऐ ।
लटाओ इसी जिन्ना, बददी गै जा,
मौती दी गोदै च खेडे ते गा ।
बिद्या ऐ सबनें गै जोतें दो रानी,
सुन्ना ते चान्दी भरण एदा पानी ।
बख्तावरो ! मान झूठा भलाओ,
बिद्या गी पूजो ते मुण्डी नुआओ ।।
(१८)
पृथ्थिया दा सार जिनें गिनी मिथी रक्खेदा,
उनें बिद्दवानें पर औंगलीं ठोआएओ नई ।
कक्खें थमां हौला तुन्दी लखमी दा ठाठ-बाठ,
उनेंगी फसाने गितै फाइयां तुस लाएओ नई ।
मस्ते दे हाथी, जड़े सौंगलें च बज्जे नई,
नायें दियां तारां उन्हें पैरें च फसाएओ नई ।।
(१९)
हंसें पर देवता करोपी होई जाग तां,
कमल-सरोवरे दा रौन-बौन खूसी लैग ।
पानी विच्चा दुद्धागी नखेड़ने दी चतराई,
हंसें दिया आत्मा चा ओ कियां चूसी लैंग ?
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला, न स्नान न विलेपन न कुसुम नालकृता मूर्धजाः ।
वाण्येका समलकरोति पुरुष या संस्कृता धार्यते क्षीयन्तेऽखिल भूषणानि सतत वाग्भूषण भूषणम् ।।२०।।
मनुष्य की शोभा न बाजुबन्दों से होती है न चान्दनीधुले हारों से। स्नान, लेप, फूल और बालों का श्रृंगार भी उसकी शोभा नहीं बढ़ाते । मनुष्य की शोभा केवल निर्मल (मीठी) वाणी से ही होती है । बाकी सभी गहने नष्ट हो जाते हैं, केवल वाणी का गहना ही साथ रहता है। (२०) बाजूबन्द मानुएंदा कोई सिंगार नई, शोभागी बदाने आले मोतियें दे हार नई । रंग रूप फुल्ल सब नकली बनौट ऐ, कंधी-पट्टी इनें बालें फरजी सजौट ऐ । मानुगी सजाने आला इक् गहना बोली ऐ, बोली जड़ी अकली दी चासनी च घोली ऐ । बाकी सब गहने फिक्के पौने ते छड़ोने न, बोली दे ए मोती नित उज्जल गै होने न ।।
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम् विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने, विद्या परा देवता, विद्या राजसु पूज्यते, न हि धनं, विद्या-विहीनः पशुः ॥२१॥
विद्या मनुष्य की शोभा है. उसका गुप्त-सुरक्षित धन है । भोग, यश और सुख विद्या ही देती है। विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेशों में विद्या ही बन्धु है। विद्या तो सब से बड़ा देवता है। राजाओं के पास बिद्या ही पूजी जाती है, धन नहीं । जो विद्या से हीन है वह पशु तुल्य है। (२१) बिद्या मनुक्खें दा असली शलैपा, ए मोती न सुच्चे, नां चोरी दा डर ऐ । पृथ्थी दे भोगें दा ए मूल मैन्तर, ए सच्चा गुरु ऐ, सुखें दा ए घर ऐ । बदेसें च मानुगी बिद्या गै स्हारा, ए बिद्या ऐ देवी, सरस्ती दा बर ऐ । राजे ते राणे न मुण्डी नुआन्दे, बे-इलमा पशु ऐ, वे-घर ऐ ते जड़ ऐ ।।
क्षान्तिश्चेत्कवचेन कि किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद्देहिनां, ज्ञातिश्चेदनलेन कि यदि सुहृद्दिव्यौषधैः किं फलम् ? कि सपैंः यदि दुर्जनाः किमु धनै विद्यानवद्या यदि, ब्रीड़ा चेत् किमु भूषणैः सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम् ।।२२।।
यदि मनुष्य में धैर्य हो फिर कवच की क्या ज़रूरत ? क्रोध हो तो दूसरे शत्रुओं की क्या जरूरत ? शरीकों के रहते आग की, मित्रों के रहते दिव्य औषधियों की, दुर्जनों के पास रहते सांपों की, निर्मल विद्या के होने पर दूसरे धन की, तथा लज्जा के रहते गहनों की और अच्छी कविता के होने पर राज्य की क्या आवश्यकता है ? (२२) लक्खें कबचें दा सान्नी धीरजा दा इक गुण, गुस्सा जित्थें होऐ उत्थें बैरियें दी लोड़ के ? अग्गी कोला बद्द अग्ग हुन्दी ऐ सरीकी दी, सच्चे मित्तरें दे हुन्दे औखदें दी थोड़ के ? दुष्टें दा साथ फिरी सप्पें कोला डर कैदा, सच्चे हुनरें दे अग्गें दौलतें दा काज के ? लज्जेआ ऐ सबनें दा उच्चा सिरताज गहना, सच्ची कवता दे अग्गै पृथ्थिया दा राज के ?
जाड्यं धियो हरति मिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नति दिशति पापमपाकर ति ।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनीति कीर्तिम् सत्संगतिः कथय किन्न करोति पुसाम् ।।२३।।
सत्संगति मनुष्य का क्या क्या उपकार नहीं करती ? बुद्धि की जड़ता को दूर करती है, वाणी में सत्य का सञ्चार करती है, मान और उन्नति का मार्ग दिखाती है तथा पापों को दूर भगाती है, चित्त को प्रसन्न करती है और सभी दिशाओं में मनुष्य की कीति फैलाती है। (२३) अकली दी मैल सारी खिना बिच दूर करे, बाणीगी सचाई कन्ने उज्जल बनान्दी ऐ। सिद्धियें दी दाती कन्नें, पापें दी ऐ घाती इयै, चित्त हरखान्दी, चिट्टा जस्स चमकान्दी ऐं । चंगे सुनसें दे कन्ने संगति दा फल दिक्खो, मानुयें दा सच्चा काया-कलप करान्दी ऐ।
अपनें दे कन्ने सच्चे हिरखा दा नाता जिनें, दुएंगी बी दया करी गलै कन्ने लान्दे न । पापियेंगी उन्दिया गै बोली च जवाब देन, सज्जनें दे गल हार प्रीता आले पान्दे न । राजें-रजबाड़ें कन्ने नीति दा बियार जिन्दा, इलमा दी जोतियेंगी मुण्डियां नोआन्दे न । बैरियें दे गुञ्जलेंगी खोलने दी सार जिनें, बड्ड - बडकें दा मान इज्जत बदान्दे न । जिनें मुनसेंगी इनें गल्लें दा ऐ सार पता, लोकचार दुनिया दा उयै ते नवान्दे न ।।
पूजन जोग कवीशर सच्चे स्त्रोत रसादे अपरम्पार । जिन्दी म्हैमा दी दुनियाँ बिच मौत बढ़ापे गी नई थार ।।
सूनुः सच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः, स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निः क्लेशलेशं मनः ।
आकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं तुष्टे विष्टपहारिणीष्टदहरी सम्प्राप्यते देहिना ॥
सच्चरित्र बेटा, सती पत्नी, सदा प्रसन्नमुख रहने वाला मालिक, स्नेही मित्र, कपट-रहित बान्धव. चिन्ता - रहित मन, सुन्दर आकृति, स्थायी धन-दौलत, तथा विद्या से पवित्र मुख, ये वस्तुये भगवान् की अपार दया होने पर ही मानव को प्राप्त होती हैं। (२६) आज्ञाकारी पुत्तर चंगा, सतबन्ती घर नार, म्हेरबान जो मालक रौहन्दा, सच्चा साथी यार । भले लोक गै रिश्ते नाते, मन चिन्ता थों दूर, बिद्या आला तेज मुआं पर दौलत बेशुमार । देआबान भगवान जिनें पर, पान्दे ए बरदान, काम-सरूपी सुन्दर जोबन, 'सील' गुणें दा सार ।।
क्षुत्क्षामो ऽपि जराकृशो ऽपि शिथिल प्रायो ऽपि कष्टां दशा- मापन्नोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि ।
मत्तेभेन्द्रविभिन्न - कुम्भ- पिशित ग्रासैक- बद्धस्पृहः, कि जीर्णो तृणमत्ति मानमहतामप्रेसरः केसरी ।।
भूख से सताया हुआ, बुढ़ापे से दुर्बल ओर प्रायः शिथिल शरीर वाला, दुखी दशा में पड़ा हुआ, विपत्तियों से घिर जाने पर तथा प्राणों पर आ बनने पर भी क्या मानियों का सिरताज सिंह घास को खाने लगता है ? नहीं; वह तो (उस समय भी) मस्त हाथी के मद से युक्त गण्ड स्थल के मांस की ही लालसा में रहता है। (२७) बुड्डा होऐ, सुक्खा होऐ, अंग अंग ढिल्ला होऐ, बिपदा दी फाइया बिच फसी गेदी जान होऐ । व्हादरें दा शिरोमणि शेर घा खन्दा नई', हाथियें दे मासा दी गै लालसा च रौहन्दा ऐ ॥
स्वल्पस्नायुवसावसे। मलिनं निर्मोसमप्यस्थि गौः, श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न च तत्तस्य क्षुधाशान्तये ।
सिहो जम्बुकमङ्कमागतमति त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं, सर्वः कृच्छगतोऽपि वांछति जनः सत्वानुरूप फलम् ।।
कुत्ता पशुकी ऐसी हड्डो पाकर भी सन्तोष कर लेता है जिस पर मांस नहीं केवल कहीं २ सूखी मैली चरबी लगी है । उससे उस की भूख भी शान्त नहीं होती। लेकिन शेर गोद में आए हुए गीदड़ को भी छोड़ कर हाथी को ही मारता है । विपत्ति पड़ने पर भी सभी अपने अपने स्वभाव और बल के अनुरूप फल की कामना करते हैं ।
(२८)
सुक्की चरबी आला दिक्खो, हड्ड पसुदा ग्खा,
कुत्ता छुद्दर नच्चे-भौंके, भुवख निं भामें जा,
सुक्खा होऐ शेर कदें भी, गिद्दड़-मास निं खा,
हाथी गी गै जाइयै मारे, बक्खो-चक्ख सव्हा ।
हर जीबै पर औन्दी दिक्खी, बिपदा सुक्ख बला,
जिगरे आला रूप जनेआ, नेआ गै फल पा ।।
लाङ्ग लचालनमधश्चरणावघातं भूमौ निपत्य वदनोदर-दर्शनं च ।
श्वा पिण्डदस्य कुरुते, गज-पुंगवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुक्ते ।।२६।।
पूछ हिलाना, पैरों के पास नीचे लोटना, जमीन पर लेट कर अपने पेट और मुख को दिखाना; रोटी देने वाले के आगे कुत्ता ऐसा ही व्यवहार करता है, परन्तु गजराज धैर्य्य से देखता रहता है और हज़ार खुशामद करने पर कहीं खाने को राजी होता है।
(२६)
पूशल हलान्दा, खल्ल पैरें दे ऐ बिलदा,
पुना लेटदा ते कन्ने पेखने बनान्दा ऐ।
रुट्टी देने आलें अग्गें कुत्त' दा कबत्तपुना,
हाथी ऐ गम्भीरता गी लाज निं लोआन्दा ऐ ।।
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥३०॥
कुसुम-स्तवकस्येव द्वयी वृत्तिर्मनस्विनाम् मूनि सर्वलोकस्य शीर्यते बन एव वा ॥३१।।
इस परिवर्तनशील ससार में कौन मरता-जीता नहीं है, लेकिन जन्म उसी का सफल है जिसके जन्म से वंश का यश बढ़ता है। ३०। फूलों के गुच्छे की तरह मानी पुरुषों को भी दो ही दशाएं प्रिय होती हैं। लोगों के सिर पर शोभा पाना या फिर जंगल (एकान्त) में ही मुरझा जाना । ३१। ( ३० ) दुनियां ऐ चक्की, दिन-रात जड़ी चलैदी, रींगें दियां रींगां मानु, दानें आङ्ग पोन्दे न । धन्न इत्थें जनम उर्ने सुनसें दा जिन्दे करी, खानदान, बैंस, जाति, सब्बै उच्चे होन्दे न । (३१) सच्चे मुनसें दी इयै असली पशान ऐ, फुल्लें आङ्ग उनें दमें रस्ते सखान्दे न । दुनिया दे सिरें पर सोबदे-सजोन्दे जां, टालियें दी गोदे च समाधियां बनान्दे न ।।
मत्यन्येऽपि वृहस्यति प्रभृतयः संभाविताः पञ्चषा- स्तान्प्रत्येष विशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते ।
द्वावेव ग्रसते दिनेश्वरनिशाप्राणेश्वरी भास्वरो, भ्रातः पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः ।। ३२॥
वृहस्पति तथा दूसरे और भी पाश्च-छे आदर पाने वाले ग्रह हैं परन्तु वीरों से वैर करने वाला यह राहु उन से शत्रुता नहीं रखता । हे भाई केवल सिर रखने वाला यह दानवों का राजा, पर्व (पूर्णिमा और अमावस) के दिन, चमकने वाले इन सूर्य्य और चान्द को ही ग्रसता है । बुध ते बिरस्पति, होर भी ग्रह न, राहु ऐ निचिन्त, इन्दे पर उसी ज्हैर नई । सवनें च बड्डे, चन्न, सूरज ए दौं न, मस्या जां पुन्नेयां गी, कदें इन्दी खैर नई। धड़ादा कपोएदा ऐ, राखसें दा राजा ए, व्हादरें ने खैरे, माड़ें कन्ने एदा बैर नई ।।
वहति भुवनश्रेणि शेषः फणाफलकस्थितां, कमठपतिना मध्येपृष्ठ सदा स च धार्यते ।
तमपि कुरुते क्रोड़ाधीन पयोधिरनादरा- दहह महतां नि.सीमानश्चरित्रविभूतयः ।। ३३।।
शेष नाग सारे संसार को अपनी फण पर उठाए हुए है। कच्छपराज अपनी पीठ पर सदा शेष को धारण किए रहता है। यह सागर कच्छपराज को कितनी असानी से अपनी गोद में बिठाए हुए है। बड़े लोगों की सीमा-रहित महिमा और बल का क्या कहना ! (७) सिरा पर शेशनागै पुञ सारी चुक्की दी, कच्छुयें दे राजै शेश पिट्ठी न बठाए दे । सूरा आली धूथनिया, कच्छुए दा डेरा ऐ, सागरा दी गोदै बिच, सब्बे न समाए दे । व्हादरें दे गौरखा ते जोरा दा के ऐन्त ऐ, इन्दे कम्में काजें आले चम्बे रौहन्दे छाए दे ।।
बरं पक्षच्छेदः समद-मघवन-मुक्त-कुलिश- प्रहार रुद्गच्छद्वहलदहनोद्गारगुरुभिः तुषाराद्रेः सूनोरहह पितरि क्लेशविबशे, न चासौ संपातः पयसि पयसां पत्युरुचितः ।।३४।।
अभिमानी इन्द्र द्वारा चलाए गए वज्ज्र के अग्निमय प्रहारों से हिमालय के पुत्र (मैनाक पर्वत) का मर जाना कहीं अच्छा होता परन्तु अपने पिता (हिमालय) को विपत्ति के वश में छोड़ कर, सागर के जल में उसका छिप जाना उचित नहीं था । (३४) मन्नी लैता इन्दरा दे बज्जरा च अग्ग ही, उस अग्गी बिच जली जाना मौत चंगी ही । पुत्तरा ने स्वारथा च बब्धागी सुलाई दिता, म्हालिया हा दुखी, घड़ी बरे आंगू लंगी ही । नक्क की बडाया, कैसी कीती ऐ 'मणाका' तू, सागरा च छप्पियै बी, जिन्द तेरी कम्बी ही ।।
यदचेतनो ऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिव कान्तः ।
तत्ते जस्वी पुरुषः परकृत- निकृति कथं सहते ।।३५।।
यदि सूर्यकान्ता मणि निर्जीव होकर भी, सूर्य की किरणों का स्पर्श होते ही जल उठती है तो फिर तेजस्वी पुरुष दूसरों के द्वारा किए गए अपमान को कैसे सह सकता है ?
(३४)
सूरजकान्ता पत्थर भामें तेज नराला ओदा ऐ,
सूरज किरणें दे छोन्दे गै तां ओ बली खड़ोन्दा ऐ।
निरजीबें दा हाल ए दिवखी, गल्ल निं समझा औंदी ऐ
तेज सरूपी मानु कोला, नादर के जरोन्दा ऐ ?
हिः शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिषु गजेषु प्रकृतिरियं सत्ववतां न खलु वयस्तेजसां हेतु ।। ३६।।
शेर का बच्चा भी निर्भय होकर उन हाथियों पर हमला कर देता है जिनके गण्डस्थलों से मद की धारा बह रही हो। तेजस्वियों का यह स्वभाव ही है। उमर के साथ तेज का कोई सम्बन्ध नहीं होता ।
(३६)
शेरें दे बचू गड़ें गी डर-भौ हुन्दा नई,
हाथियें दे मत्थें पर चढ़ी-चढ़ी बौन्दे न ।
व्हादरी दा उमरी दे कन्ने किज नाता नई,
बीरता दे भाव सुच्ची आतमा च रौहन्दे न ।।
जातियांतु रसातलं गुणगणस्तस्याप्यधो गच्छे शीलः शैलतटात्पतत्वभिजनः सन्दह्यतां वहिनना ।
शौयें वैरिणि वज्ज्रमाशु निपतत्वर्थो ऽस्तु नः केवलं, येनैकेन विना गुणास्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे ।।३६॥
जाति रसातल में जाए, दूसरे गुण उससे भी कहीं दूर नीचे जा गिरें, शील पहाड़ की चोटी से गिरे, बन्धु-बान्धव आग में जल जाएं, बहादुरी रूपी शत्रु पर बिजली गिरे । हमें तो केवल धन की लालसा है. जिसके विना ये सभी गुण, तिनकों की तरह हल्के (और मूल्य-हीन) होते हैं।
( ३६ )
जाति पवै डबरी च, धाड़े जान गुण सारे,
सील सुट्टो खड्डा, गल्ल व्हादरी दी लाएओ नई ।
खानदानी कोल्लें ते पटारें च टकाओ तुस,
धरमा दी गल्ल भुल्ले-कुत्थे बी चलाएओ नईं ।
पैसे बिना गुण सारे, सुक्के सड़े तीले न,
पैसा गै जे राजा सारे गुणें दा, भुलाएओ नई ।।
-नीन्द्रियाणि सकलानि तदेव कर्म सा बुद्धि र प्रतिहता वचनं तदेव अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव त्वन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत् ।।३८।।
सभी इन्द्रियां भी वैसी ही रहती हैं, काम-काज भी वैसा ही रहता है, अक्ल भी वही पहले जैसी तेज़ होती है, वचन भी वैसे ही होते हैं, लेकिन धन की गर्मी के न रहने पर मनुष्य एक क्षण में ही बदल कर और का और हो जाता है। यह कितनी विचित्र बात है !
(३८)
मानुएं दे हत्थ-पैर पहलें आङ्ग रौहन्दे न,
कम्में-काजें बिच, कोई फरक बिन्द पौन्दा नईं ।
अकल बी उऐ, कन्ने बोलचाल उऐ नेई,
धना दा ऐ जादू, एदा थौह किज थोन्दा नईं,
धना दी खमारी बिना, अबज तमासा दिक्खो,
मानु बदलोन्दा इयां फिरी पनशोन्दा नईं ।॥
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः सः पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।
स एव वक्ता, सच दर्शनीयः सर्व गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ।।३६।।
जिसके पास धन है वही मनुष्य कुलीन समझा जाता है, वही पण्डित तथा शास्त्रों और गुणों का जानकार माना जाता है। वही वक्ता (अच्छा भाषण करने वाला) और वही दर्शनयोग्य समझा जाता है । सभी गुण सोने के अधीन रहते हैं।
( ३È ) खानदानी ओदी जेदी गण्डिया च पैसे न, चतर, सयाना उयै पंडत, रजादा ऐ । सुनदे न गल्ल ओदी, दिक्खने दे जोग उयै, सबनें गुणें दा बस, 'सुन्ना-चान्दी' दादा ऐ ॥
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य, यो न ददाति न भुक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ।।४०।।
दान देना, खर्च करना और नष्ट हो जाना धन की यही तीन दशाएं होती हैं। जो न दान देता है न अपने लिये खर्च करता है, उसके धन की फिर तीसरी दशा ही होती है।
(४०)
दान, भोग जां जाया होना,
त्रौं गतियें धन रौहन्दा ऐ।
नां खन्दे, नां दिन्दे जेड़े
उन्दा धन "खूह पौन्दा" ऐ ।।
दौर्मन्त्र्यान्नृपतिविनश्यति, यतिः संगात्सुतो लालना विप्रो ऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।
ह्रीर्मद्य। दनवेक्षणादपि कृषिः, स्नेहः प्रवासाश्रया- न्मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरणयात्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ।।४१।।
बुरी सलाह से राजा, (सांसारिक सुखों की) संगति से यति, अति लाड-प्यार से पुत्र, न पढ़ने से ब्राह्मण, बुरी औलाद से खानदान, दुष्ट आदमी की सेवा से शील, शराब पीने से लज्जा, बिना देख भाल के खेती, (देर तक) विदेश में रहने से स्नेह, अनुराग न होने से मित्रता और लापरवाही के साथ लुटाने से धन नष्ट हो जाता है। (૪૨) बुरी सलाएं राजे मरदे, भोगें फसियै ज्ञानी, लाडें-लाडें पुत्तर गलदेः अनपढ़ पंडत मानी । बुरी लोआदी बैंस पटोन्दे, शील कबत्ते सार्थे, मद-मदरा ने शरम निं रौहन्दी हिरख बदेसें बासें । खसमें भुल्ली खेती गलदी, बिन परतीतें यारी, बुरी कुचालें दौलत रुड़दी, प्रीता-सुक्खी नारी ।।
मणिः शखोल्लीडः, समरविजयी हेतिदलितो, मदक्षीणो नागः, शरदि सरिदाश्यानपुलिना ।
कलाशेषश्चन्द्रः, सुरतमृदिता बालवनिता तनिम्ना शोभन्ते, गलितविभवाश्चथिषु नराः ॥४२॥
सान पर चढ़ा कर तराछी हुई मणि, युद्ध-भूमि में घावों के लगने से दुर्बल हुआ सूरमा, मद के कारण कमजोर हाथी, और शरद ऋतु में स्वल्प जलधारा वाली (निर्मला) नदी, दूज का चान्द, संभोग से शिथिल हुई कोमलांगी युवती, और याचकों में धन लुटा कर दरिद्र होने वाले (भाग्य शाली) मनुष्य - इन सब की दुर्बलता ही उनकी शोभा बनती है । (૪૨) हाथी मदा दे लिस्से सोवन, सान चड़ेदे हीरे, व्हार सयाला पतली धारें बगदे निरमल नीरे, रणभूमि दे घायल कीते बांके सूरे बीरे, उत्तम कम्में दौलत लाइयै बनदे जो न फकीरे, पतली सोबै चन्द्रकला ते मानु दुखी बजोगी, ए लिस्सापन बनदा शोभा कवियें दा मन चीरें ।।
परिक्षीणः कश्चित्स्पृहपति यवानां प्रसृतयै स पश्चात्संपूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम् ।
अतश्चानेकान्ता गुरुलघुतयार्थेषु धनिना- मवस्था वस्तूनि प्रथयति च सङ्कोचयति च ।।४३।१
भूखा होने पर जो आदमी मुट्ठी भर यवों के लिए तरसता है, धन-सम्पत्ति मिल जाने पर वही आदमी सारे संसार को तिनके के समान समझने लगता है। इस प्रकार धनियों की यह परिवर्तनशील अवस्था का उतार-चढ़ाव ही बस्तुओं को भी छोटा और बढ़ा बना देता है । (४३) भुक्खा कन्नै व्याकल होइयै लप्प जमें दी मंगदा ऐ, धना दे औन्दे उयै मानु, ऐंठी ऐंठी खंगदा ऐ । बक्खो-बक्खे रूप बनान्दा, माया इसगी छलदी ऐ, कदें तलाइयें नौन्दा हसदा, सागर गै कदें मंगदा ऐ ॥
राजन् दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमेनां, तेनाद्य वत्समिव लोकममु पुषाण ।।
तस्मिञ्च सम्यगनिशं परिपुष्यमाणे ।
नानाफलं फलति कल्पलतेव भूमिः ॥४४।।
हे राजन ! यदि तू इस पृथ्वी रूपी गाय को दोहना चाहता तो जनता को उस (गाय का ) बच्छड़ा समझ कर उसकी परवरिश करो । यदि जनता रूपी बछड़ा अच्छी तरह से पाला-पोसा जाएगा तब यह पृथ्वी भी कल्पलता की तरह अनेक प्रकार के फल देगी । (नवयुग की क्रान्ति के आलोक में स्वतंत्र अनुवाद) (४४) पुञ कामधेनु, बच्छु जनता बनाई लेई, गुज्जरें दा कम्म, राजें सेवा अपनाई लेई । सेवा दे पखण्डियें दी आपराजी दिक्खो तुस, बनी गे कसाई, कुते 'डेरी' गै चलाई लेई । तंग पेदे बच्छुयागी रस्ता निं होर लब्बा, सिद्दी-पुट्ठी टक्करें ओ गुजरी गै ढाई लेई ।।
सत्यानृता च परुषा प्रियभाषिणी त्व. हिस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या ।
नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च, वार। ङ्गनेव नृप-नीतिरनेकरूपा ।।४५।।
कहीं सच्ची, कहीं भूठी, कहीं कटु- भाषिणी कहीं मधुर-भाषिणी, कहीं निर्दय कहीं दयालु, कहीं लालची कहीं उद्वार, कभी खुले हाथों खर्च करने वाली और कभी पैसा-पैसा जोड़ने वाली – यह राजनीति वैश्याओं की तरह अनेक रूप धारण करती है। (४४) सच-झूठ दमें एदी अक्खियें दे शारे न, कौड़ ते मठास दमें गुण एदे प्यारे न । दया दा स्रोत कढ़ें, हिंसा दी कटारी ऐ, दानियें दी आगू कदें, लोभी अति भारी ऐ । तलियें दी मैल जन पैसे ए लटान्दी ऐ, बेसवा ऐ राजनीती, पेखने बनान्दी ऐ ।।
विद्या कीर्तिः पालनं ब्राह्मणानां दानं मोगो मित्र-संरक्षणं च ।
येषामेते षड्गुणा न प्रवृत्ताः को ऽर्थस्तेषां पार्थिवोपाश्रयेण ।।४० ।।
जिन लोगों ने राज दरबार की सेवा में रह कर भी न विद्या प्राप्त की, न यश कमाया, न विद्वानों का पालन करना सीखा, नं दान दिया, न सुख भोगा और न मित्रों की ही परवरिश की - इन छै गुणों के बिना उनकी राज-सेवा का क्या लाभ हुआ ? (४६) विद्या निं सिक्खी जिनें, शैल खादा-लाया नई, जस, मान, दान जिनें बिन्द बी कमाया नईं । मित्तर निं पाले, नां गै पंडतें दी पूजा कीती, राजे कैसी सेचे, उनें फल कोई पाया नई ?
यद्धात्रा निज भालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा पून, तत्प्राप्नोति मरुस्थले ऽपि नितरां मेरौ च नातो. कम् ।
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्ति वृथा मा कृथाः कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह नाति तुल्यं जलम् ।। ७।।
विधाता ने मानव के मस्तक पर थोड़ा-बहुत जितना ध लिख दिया है, उतना ही उसे मरुभूमि में या मेरु नामक सुवर्ण पर्वत पर मिलेगा, उससे अधिक नहीं । इस लिए हे मानव धैर्य्य धारण कर और धनवानों के आगे वृथा हाथ न फैला । क्योंकि घड़ा चाहे कुएं में डाला जाए या सागर में, बराबर ही जल ग्रहण करता है । (४७) बिद्दमाता लिखी दिन्दी मानुएं दे मत्थै पर थोड़ा-मता, जिन्ना धन मानुएं गी थोना ऐ । थोई जन्दा उसी भाएं जाड़ें भाएं प्हाड़ें जा, धीरजा 'नै कम्म लै मना ! कैदा रोना ऐ ? पैसे दे घमण्डा अग्गें कदें मिमिआयां नईं, होना जड़ा होना, नई होना-नइयों होना ऐ। सागरा च डोवो, भाएं खुआ बिच डोबी दिक्खो, घड़े बिच पानी मना ! उन्ना गै भरोना ऐ ॥
मिव चातकाधारो ऽसीति केषां न गोचरः ।
किमम्भोदवरास्माकं कार्पण्योक्ति प्रतीक्ष्यसे ।।४८।।
हे सुन्दर बादल, पपीहों के लिए तुम्हीं एक आधार हो. यह बात संसार में सभी जानते हैं। फिर तुम, हमारी (पपीहों की) दीन प्रार्थनाओं की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हो ? (स्वयं ही पसीज कर क्यों नहीं बरस जाते ?) (४८) सारे जीव जैन्त एस गल्ला दे गोआई न, चातकें-चकोर नित्त आस तुन्दी लाई ऐ । कालियो घटाओ ! हुन आओ तरसाओ नई, मिन्नतें - खशामदें दी हीखी कैसी लाई ऐ ?
रे रे चातक सावधानमनसा मित्र ! क्षणं श्रूयत मम्भोदा बहवो वसन्ति गगने, सर्वे ऽपि नैतादृशाः ।
केचिदृष्टिभिराद्रियन्ति वसुधां, गर्जन्ति केचिद् वृथा, यं यं पश्यति तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं बचः ।॥४६।।
हे मित्र पपीहे ! एक क्षण के लिए ध्यान-पूर्वक मेरी बात सुन ले । आकाश पर बादल तो अनेक हैं परन्तु सभी एक समान नहीं । इन में से कुछ तो वर्षा से धरती की प्यास बुझा देते हैं, परन्तु कई व्यर्थ ही गर्जते हैं। इस लिए यह उचित नहीं कि तू जिसे भी देखे उसी के आगे दीन होकर गिड़गिड़ाने लगे ।
(૪૬) चातका तू' चित्त लाइयै गल्ल मेरी सुनी लै, गासा पर बदलें दा जिन्ना घरमोल ऐ, सब्बनेंगी इक अक्खीं दिक्खी भलखोएआं नई, गरजा दा मता जड़ा, उयै खाली ढोल ऐ । ठण्डियें फुहारें आला दानी मड़ो कोई कोई, खाली देगां मतियां ते झूठा इन्दा शोर ऐ। जने खने अग्गें जरा इयां मिमिआयां नई, खमें दी ए मैफल ऐ ते झूठी घनघोर ऐ ।।
अकरुणत्वमकारण विषहः, परधने परयोषिति च स्पृहा ।
सुजनबन्धुजनेष्वसहिष्णुता, प्रकृतिसिद्धमिदं हि दुरात्मनाम् ।।५०।।
निर्दय होना, बिना कारण ही झगड़े खड़े कर देना, पराए धन तथा पर-स्त्री की लालसा करना, भले लोगों और बन्धुजनों (की बात) को सहन नहीं करना, दुष्ट लोगों का यह स्वभाव ही होता है।
(५०)
लालसा पराइयें धन-धियें पर रवै नित्त,
म्हेशां बेक्यासे रौहना, जफ्फियां लोआनियां ।
मित्तरें सम्बन्धियें दी आखी दी झलोऐ नई,
खोटी बुद्धि आले दियां पक्कियां नशानियां ।।
दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालंकृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ।।५१।
दुष्ट मनुष्य चाहे विद्या के गहनों से ही सजा हुआ क्यों न हो, दूर से ही नमस्कार करने योग्य होता है। मणि से भूषित सर्प क्या भयंकर नहीं होता ?
(५१)
विद्या दे गहने दिक्खी चित्त भरमाएओ नई
खोटी बुद्दि जिन्दी उन्दा करेओ बसा नई ।
मण जिन्दे मत्थे पर जोतियां जगान्दी ऐ,
सप्प न ओ डाडे, उन्दे कच्छ कोई जा नई ।।
जायं ह्रौमति गण्यते, व्रतरुचौ दम्भः शुचो कैतवम् ।
शुरे निघृणता, मुनौ विमतिता, दैन्यं प्रियालापिनि ।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरिता वक्तव्यशक्तिः स्थिरे ।
तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनां ये दुर्जनैर्नाङ्कितः । ५२।।
लज्जा वालों को ये जड़ समझते हैं, व्रत-नियम की रुचि को पाखण्ड, पवित्र व्यवहार को धोखा, वीरता को निर्दयता, (मौन रहने वाले) मुनि को जड़बुद्धि, मधुरभाषी को डरपोक, तेजस्वी पुरुष को अभिमानी, और बोलने में चतुर व्यक्ति को वाचाल समझते हैं। गुणियों का वह कौनसा गुण है जिसे ये दुष्ट लोग बुरा नहीं कहते ?
(५२)
सील-लज्ज इन्दे गितै जड़ें दी नशानी ऐ,
व्हादर कसाई, मानु सिद्धा बस डंगर ऐ ।
सोचा आला मूरख ऐ ते दब्बू जड़ा हलीम ऐ,
धरम-करम इन्दे गितै स्वारथा दा डम्बर ऐ ।
गुणियें च 'गुण' जेड़ा, पापी उसी 'दोस' आखै
खोटी बुद्ध मानुएं दी भूठा द। गै जंदर ऐ ।।
लोभश्चेदगुणेन कि, पिशुनता यद्यस्ति कि पातकैः सत्यं चेत्तपसा च कि, शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् सौजन्यं यदि कि बलेन, महिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि कि धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ।।५३।।
यदि मनुष्य में लालच का अवगुण हो तो फिर दूसरे दुर्गुणों से क्या ? चुगली खाने वाले को दूसरे पापों से क्या ? सत्य हो तो फिर तप की क्या आवश्यकता है ? मन यदि पवित्र है तो फिर तीर्थों की इच्छा व्यर्थ है । सज्जनता के रहते शारीरिक-बल और यश होने पर शरीर की सजावट व्यर्थ है । अच्छी विद्या पास हो तो धन की कमी नहीं और यदि अपकीति है तो मौत का भय किस लिए ? (३६) चुगली दे पापा तुल्ल पाप कोई दुआ नई, लालचा दे हुन्दे दुए औगनें दी थोड़ के ? सच्चा कोला बद्द कोई तप नइयों, जोग नई, मन साफ हुन्दे फिरी तीरथें दी लोड़ के ? इज्जत ऐ जेदी उसी गहनें दी म्हताजी नई, सीलवेन्त जड़े उन्हें अग्गें होर जोर के ? इलमा दे अग्गें धन मुण्डियां नोआंदे न, अपजसा कोला बद्द मौती दा मरोड़ के ?
शशी दिवसधूसरा गलितयौवना कामिनी, सरो विगतराजीवं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः ।
प्रभुर्धनपरायणः सततदुर्गतिः सज्जने, नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्तव शल्यानि मे ।।५४।।
दिन के समय का फीका चान्द, ढली हुई जवानी वाली सुन्दर नारी, कमल-रहित सरोवर, विद्या-रहित सुन्दर मनुष्य, लालची स्वामी, विपत्ति में फंसा हुआ सज्जन पुरुष, राजा की सभा में दुष्ट मनुष्य की प्रधानता- ये सात बातें मेरे मन में शूल बन कर चुबती हैं। (५८) दिना दै बेल्लै फिक्का फिक्का चन्न दोआसी लान्दा ए, जोबन-ढलदी कामनियें दा रूप बड़ा कलपान्दा ऐ । कमलें बाजू ताल-सरोवर, बे-इल्में दी सुन्दरता, कृपण-सुभा दा बख्तावर बी, आदर मूल निं पान्दा ऐ । सज्जनता दी लाचारी 'ते चौधर चुगल मनुवखें दी, सच्चें गल्लें द। ए भूरा, हरदम मिगी सतान्दा ऐ ॥
न कश्चिच्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भूभुजाम् ।
होतारमपि जुह्वानं स्पृष्टो दहति पावकः ।।५५०
मन में भयंकर क्रोध की ज्वालाओं को बसाने वाले इन राजाओं के लिए कोई भी अपना नहीं होता (चाहे कोई कितनी ही भक्ति से इनकी सेवा करने वाला हो) जैसे यज्ञ की आग छू जाने पर आहुति डालने वाले यजमान (के हाथ) को भी जला देती है । ( प्र प्र ) ममता-परीता आले फुल्ल इनें भाखे नई, हकूमता दे नशै अन्ने राजे गालीं दिन्दे न । लक्ख शरधा दे कन्ने औहतियां चड़ाओ तुस, हवना दे सेक-ता हत्थ जाली दिन्दे न ।।
मौनान्मूकः प्रवचनपटुर्चाटुलो जल्पको वा धृष्टः पाश्व भवति च वसन् दूरतो ऽप्यप्रगल्भः ।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः सेवाधर्मः परमगहनो, योगीनामप्यगम्यः ।।५६।।
(सेवक) चुप रहे तो गूंगा. बोलने में चतुर हो तो वकनादी, पास रहे तो डीठ, दूर रहे तो जड़, सहन-शील हो तो रपोक और न सहे तो नीच समझा जाता है। सेवक का काम सच ही, बड़ा कठिन है- योगियों की साधना भी इस के आगे फीकी पड़ जाती है । (५६) चुप चाप रवै, घट बोलै, घट मू ंह खोलै, जल्लड़ ते गु ंगा आखी-आखियै सतान्दे न । गल्लेंगी सेआना लब्बै, हाजर-जवाब होऐ, 'चपल ऐ जी बड़बोला' भण्डियां करान्दे न । हर बेल्लै कोल रवै, हुकमा दी हीखिया च ढीठ आखी आखी ओदा मन कलपान्दे न । दूर-दूर रवै कन्ने मालकें दा डर बुज्जै जक्कर, गोआर, कम्मचोर तां बनान्दे न । मना बिच कुरै, अखीं अत्थरू निं औन देऐ दब्बू ते डरौक आखी चुब्बां ए करान्दे न । दुख नइयों जरै, बेन्याई दी शकैत करै उसगी कमीना, ओच्छा आखियै रोआन्दे न । सेबकी दे दुक्खें नेआ दुक्ख होर कोई नई जोगियें दी साधना गी परसा बगान्दे न ।॥
उद्भसिताखिलखलस्य विशृंखलस्य, प्रोद्गाढ़ विस्मृतनिजाधमकर्मवृत्तेः ॥
दैवादवाप्तविभवस्य गुणद्विषो ऽस्य ।
नीचस्य गोचरगतैः सुखमास्यते कैः । ५७।।
उस नीच मनुष्य के पास रह कर कौन सुखी रह सकता है, जो हर तरह से दुष्टता को प्रश्रय देता है और निरकुश है, जिसे आनी अधम (नींच) वृत्ति की रत्ति भर भी पहचान नहीं और गुणों से घृणा रखते हुए भी जिसे भाग्य की दी हुई दौलत मिल जाती है ? (५७) माड़े ते कवत्ते लोग, जिन्दै स्हारै जीन्दे न, चंगे-मन्दे कम्में आले बन्धनें थों न्यारे न । नीचता दे कम्मे बिच रुज्झेदे गै रौहन जड़े, भागें लाई दित्त जिन्दै धना आले ठाले न । ऐसे नीच मानुएं दी सेवा सेज अग्गू दी, जिन्दे पायें अग्गें गुण गुणियें दे हारे न ।
आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लध्वी पुरा बृद्धिमती च पश्चात् ।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छायेव मैत्री खल-सज्जनानाम् ।।५८।।
दिन के पहले पहर की छाया के समान दुर्जनों की मित्रता भी शुरू में घनी होती है लेकिन शनैः शनैः कम होती जाती है। दोपहर बाद की छाया के समान सज्जनों की मित्रता शुरू में तो हल्की होती है परन्तु बाद में उत्तरोत्तर घनी होती जाती है । (५८) लुच्चड़ें दी यारी जियां छां ऐ सबेरे दी, मुण्ड भाएं घना फिरी संगदी गै जन्दी ऐ । सज्जनें दी यारी जियां छां ऐ दुपहरीं दी, मुण्ड एदा होला फिरी बददी गै जन्दी ऐ ।।
मृगमीनसज्जनानां तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम् लुब्धक-धीवर-पिशुना निष्कारणमेव वैरिणो जगति ।।५६।।
हिरण, मच्छली और सज्जन (क्रमशः) घास, जल और सन्तोष पर ही निर्वाह करते हैं, फिर भी इस ससार में शिकारी, माहीगीर और चुगल पुरुष विना कारण ही इन से वर करते हैं ।
(५६)
हिरणें दा, मच्छियें दा, सज्जनें दा जीन दिक्खो,
घा, पानी, सवरा दा जिनें बस स्हारा ऐ ।
फिरी बी शकारियें ते माहीगीरें, चुगलें,
हरदम हत्थ लेदा बैरा दा कटारा ऐ ॥
वाञ्छा सज्जनसंगतौ, परगुणे प्रीतिर्गुरौ नम्रता, विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद्भयम् ।
भक्तिः शुलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खलै- रेते येषु वसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्यो महद्भ्यो नमः ॥६०॥
जिन्हें (सदा) सज्जन व्यक्तियों की सत्संगति की ही लालसा रहती है, दूसरों के गुणों पर जिन्हें प्रसन्नता होती है, बड़ों के सन्मुख जो नम्र रहते हैं, विद्या की जिन्हें रुचि है, अपनी धर्म-पत्नी से सच्चा अनुराग है, (कामारि) शिव की भक्ति में जो लीन हैं, अपनी इन्द्रियों के दमन में ही जिनका बल लगता है, दुष्टों से जो दूर रहते हैं- ऐसे निर्मल गुणों के भण्डार महात्माओं के चरणों में मेरी नमस्कार है ।
(६०)
सज्जनें दी संगति दे जड़े परवाने सदा,
गुण दिक्खी सबनें दे, खुशियां मनान्दे न ।
विद्या-पुजारी, नारी अपनी प्यारी जिनें,
पूजने दे जोग जड़े, उन्दे गुण गान्दे न ।
लोक-निन्दा थमां डरी, संजमा च रौहन जड़े,
पापियें दे कन्ने हेल-मेल निं बदान्दे न ।
ऐसे जड़े गुणी, उन्दी धूड़ लाओ मत्थे पर,
शिवें आली साधनागी चिचें जो बसान्दे न ।।
विपदि धैर्य्यमथाभ्युदये क्षमा ।
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।।
यशसि चाभिरुचि-व्यसनं श्रुतौ ।
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ ६१।।
विपत्ति में धैर्य्य रखना, उन्नति में सहनशील होना, सभा में बोलने की चतुराई, रणभूमि में वीरता दिखाना, यश के लिए रुचि रखना और ज्ञान पाने के लिए सच्ची लालसा -महात्मा पुरुषों में ये बातें स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं। (६१) दौलता दे औन्दे जिन्दी हलीमी बदी जन्दी ऐ, विपदा दे छल्ल जिन्दा हौसला बदान्दे न । म्हैफलें च बाणी जिन्दी मन मोही लैन्दी ऐ, बीरता दे कम्म जिन्दे चित्तागी हसान्दे न । बिद्या ते कला कन्ने गूढ़ी ऐ परीत जिन्दी, जस्सा दे ओ सुक्खे, सच्चे 'मुनस' खोआन्दे न ।।
-करे श्लाध्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता, मुखे सत्या वाणी, विजयी भुजयोर्वीर्यमतुलम् ।
हृदि स्वच्छा वृत्तिः श्रुतमधिगतं च श्रवणयो- विनाप्यैश्वर्येण प्रकृतिमहतां मण्डनमिदम् ॥६२॥
दान देना जिन के हाथों की शोभा है, गुरुओं के लिए नम्रता सिर की. सच्ची वाणी मुख की, विजयी अपूर्व बल भुजाओं की, स्वच्छ चित्तवृत्ति हृदय की और प्राप्त किया हुआ सच्चा ज्ञान जिनके कानों की शोभा है-वे सच्चे महात्मा लोग धन के बिना भी सदैव इन गहनों से शोभित रहते हैं। (६२) दान देना खुशी कन्ने हत्थें दी सजौट ऐ, सील ते हलीमी जिन्दं मत्थे दा संगार ऐ । सच्चे-सुच्चे बोल जिन्दे मुखड़े दी शोभा न, बामें च समाया सच्चे जोरा दा खमार ऐ । दुद्धा आङ्ग चिट्टी जिन्दे चित्ता दी वृत्ति ए, कन्नें सुनी लैता जिनें ज्ञाना आला सार ऐ । उनें गुणवानें, हीरें मोतियें दी लोड़ नेई, गुण उन्दे गहने, गुण फुल्लें दी बहार ऐ।
प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यम्, काले शक्त्या प्रदानं, युवतिजनकथामूकभावः परेषाम् ।
तृष्णा स्रोतोविभङ्गो गुरुषु च विनयः, सर्वभूतानुकम्पा, सामान्यं सर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिः श्रेयसामेष पन्था ।। ६३।।
दूसरों को चोट पहुंचाने से दूर रहना, दूसरों का धन छीनने की बात न सोचना, सच बोलना, समय समय पर यथाशक्ति दान देना, सुन्दर कामिनियों की चर्चा से उदासीन रहना, लालच और लालसा की धारा को रोकना, बड़ों के आगे नम्रता दिखाना, सब प्राणियों पर दया और सभी शास्त्रों के प्रति आदर भाव रखना, कल्याण का यही (प्रशस्त) मार्ग है ।
(६३)
तुन्दी मममा दा स्हारा जीव-जैन्त पांदे रौहन,
हिंसा आली अग्ग तुस कढ़ेंबी जगाएओ नई ।
लालचा दी डबरी च तन्दुएं दा बास ऐ,
दुएं दी कमाई तुस खूसने गी जाएओ नई ।
जोबना दे घोड़े अति मु'हजोर हुन्दे सदा,
संजमा दी बाग बिंद हत्था ढलकाएओ नईं ।
गुरुएं दी पूजा गितै ज्ञान-जोतां बालेओ,
सज्जनें दे पैण्डे आली घास ए भुलाएओ नई ।।
संपत्सु महतां चित्त भवेदुत्पल-कोमलम् ।
आपत्सु च महाशैल-शिला-संघातकर्कशम् ।।६४।।
धन-दौलत में सज्जन-महात्माओं के मन कमल के समान कोमल बने रहते हैं, परन्तु विपत्ति आ पड़ने पर वही (कोमल मन) विशाल पर्वत की शिलाओं के समूह की तरह कठिन-कठोर हो जाते हैं ।
(६४)
सत्पुरखेंगी धन जे थोऐ,
फुल्लें आंगू हसदे न ।
चिपदा दिक्खी डरदे नइयों,
कुप्पड़ बनियै दसदे न ।
प्रिया न्याय्या वृत्तिर्मलिनमसुभङ्ग ऽप्यसुकरं, त्वसन्तो नाग्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः ।
विपद्यच्चैः धैर्यं पदमनुविधेय च महतां, सतां केनोद्दिष्ट विषममसिधाराव्रतमिदम् ।।६५।।
जिन्हें न्याय का मार्ग सदा पसन्द है, प्राणों पर बन आने पर भी जो बुरा काम नहीं करते, बुरों की खुशामद नहीं करते, मित्र को निर्धन देख कर, जरूरत रहने पर भी उससे सहायता नहीं मांगते, विपत्ति में जिनके हौसले ऊचे हो जाते हैं, जो सदा बड़ों के पद-चिह्नों पर चलते हैं, इन भले लोगों को तलवार की धार पर चलने जैसा यह कठिन मार्ग अपनाने के लिये किसने उपदेश दिया है ?
(६५)
न्यां दियें जोतियें दे जड़े परवाने न,
मांनुएं कवत्तों अग्गें कदें मिमियान्दे नई ।
माड़े कम्में कन्नें उन्दा मुण्डुआं दा बैर ऐ,
दुखी दिक्खी मित्तरागी बेदन सनांदे नई ।
विपदा दे छल्लें बिच हिम्मत जगाई लैन्दे,
गैं सच्चे पैण्ड थमां बक्खरी टकांदे नई ।
तेज तलोआरें पर दुरने दे तुल्ल जरो,
सज्जन सनीति आले बिंद घबरांदे नई ।।
प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते संम्भ्रमविधिः प्रियं कृत्वा मौनं, सदसि कथनं चाप्युपकृतेः ।
अनुत्सेको लक्ष्म्यां निरभिभवसाराः परकथाः सतां केनोद्दिष्ट विषममसिधाराव्रतमिदम् ।।६६।।
गुप्त दान देना, घर आए का आदर-सत्कार करना, उपकार करके खामोश रहना, दूसरे के उपकार की चर्चा भरी सभा में करना, धन होने पर घमण्ड न करना, और बातचीत में दूसरों की निन्दा से बचे रहना सज्जन पुरुषों को खङ्ग की धार पर चलने के समान यह कठिन व्रत धारण करने की प्रेरणा किसने दी है ?
(६६ )
भ्यागतेंगी दिक्खी करी अक्खियां बछाई दिन्दे
दान दिन्दे चोरी, ओदी गल्ल कदें लांदे नई ।
दौलता दे हुन्दे अभमान जिनें नई भाखा
नेकियां कांदे, कदें चौखटें मड़ांदे नई ।
कवां बनान्दे नित्त दुएं दी भलाइयें पर
निन्देआ पराई करें भुल्लियै चलांदे नई ।
तेज तलोआरें पर दुरने दे तुल्ल जरो,
सज्जन सनीति आले बिन्द घबरांदे नई ।।
सन्तप्तवायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न श्रूयते मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं दृश्यते ।
अन्तः सागर-शुक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते, प्रायेणाधममध्यमोत्तमजुषामेवविधा वृत्तयः ।।६७।।
गर्म लोहे पर गिर कर जल की बून्द का निशान तक बाकी नहीं रहता; वही बून्द कमलिनी के पत्र पर मोती जैसी रमणीय आकृति प्राप्त कर लेती है परन्तु सागर के जल में पड़ी हुई सीप के मुंह में गिर कर वह स्वयं एक मोती बन जाती है । अधम. मध्यम तथा उत्तम संगति में पड़ने के अलग २ ऐसे ही फल होते हैं ।।
(६७)
अति तत्ते तवे पर बून्द जली जन्दी ऐ,
कमलें दे पत्ते रूप मोती दा दोआंदे न ।
सागरा दी सिप्पी उसी मोती गै बनाई दिन्दी,
संगती तें जादू तली सरेआं जमान्दे न ।।
यः प्रीणयेत् सुचरितैः पितरं स पुत्रो, यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् ।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं य- देतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥ ६८।।
वही पुत्र श्लाघ्य है जो अपने शुभ आचरण से माता-पिता को प्रसन्न करता है; नारी वही श्लाघ्य है जो पंति की कल्याण-कामना में लगी रहती है; सच्चा मित्र वह है जो दुःख और सुख दोनों दशाओं में एक समान मित्रता निभाता है । ये तीन संसार में किसी भाग्यवान् को ही मिलते हैं ।
(६८)
नार, जेदा कैन्ता कन्ने मन-चित्त लग्गा दा,
पुत्तर, सनीतियें दा जस्स जो कमांदा ऐ ।
साथी, जड़ा सुख-दुख साझा करी बण्डी लै,
हीरे न त्रै, कोई भागें आला पान्दा ऐ ।।
एको देवः केशवो वा शिवो वा, एकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा ।
एको वासः पत्तने वा वने वा, एका नारी सुन्दरी वा दरी वा ।।६६।।
& (लक्ष्मीपति) विश्णु अथवा (कामारि) शिव इन दोनों में से एक को अपना इष्टदेव बना लो । राजाओं और (वैरागी) यतियों में से एक के साथ रहो। नगर में रहो या जंगल की बस्ती को अपना लो । घर की स्त्री से अनुराग करो या पहाड़ी कन्धरा की गोद में बसेरा करो। [प्रवृत्ति और निवृत्ति-इन दोनों में से एक मार्ग चुन लो ।]
(५०)
शिवशंकर ते विष्णु बिच्चा,
इष्ट प्यारा मन्नी लै ।
जां राजे, जां जतियें कन्ने
जारी पक्की खन्नी है ।
प्रीत करी लै नारी कन्ने
जां खोह प्हाड़ी मल्ली लै ।
नग्गर गैह जां जंगल रौह तू
मन इक पासै बन्नी लै ॥
नम्रत्वेनोन्नमन्तः परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः स्वार्थान् सम्पादयन्तो विततपृथुतरारम्भयत्नाः परार्थे ।
क्षान्त्यैवाक्षेप रूक्षाक्षरमुखरमुखान् दुर्जनान् दुःखयन्तः, सन्तः साश्चर्यचर्या जगति बहुमताः कस्य नाभ्यर्चनीयाः ।।७०।।
& जो नम्र रह कर उन्नति करते हैं, दूसरों का गुणगान ही जिनके अपने गुणों की कहानी सुनाता है, जो दूसरों का हित करने के विशाल प्रयत्नों से वस्तुतः अपने काम सिद्ध कर लेते हैं, जो सहनशीलता से ही कटुभाषो दुर्जनों को दण्ड देते हैं, ऐसे आश्चर्य भरे कार्य्य करने वाले, नमस्य सन्त लोग संसार में किसके पूजनीय नहीं हैं ?
(७०)
निमरता च नीमें होइय उच्ची पदवी पांदे न,
दुएं दे गै गुण-जस गाइयै, अपने गुण प्रगटांदे न ।
परस्वारथ गै स्वारथ उन्दा, स्वारथ दुआ भाखा नई,
तां परस्वारथ करिये हसदे, मनभान्दा फल पांदे न ।
स्टैनशीलता कन्ने जरदे खोटे बोल कबत्त दे,
इस्से शीतलता दे कन्नेखोटी अग्ग बजांदे न ।
धन्न न ऐसे सैन्त-सुहाने, चरज गै उन्दी करनी ऐ,
उन्दे चरणें दो तां मानु धृड़ सिरै पर लांदे न ॥
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः, नवाम्बुभिदूरविलम्बिनो घनाः ।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः, स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ।।७१।।
श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन, दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन ।
विभाति कायः करुणाकुलानां, परोपकारेण न चन्दनेन ।।७२।।
फल जितनी अधिक मात्रा में लगते हैं, वृक्ष उतने ही भुक जाते हैं, नए जल भर कर लाने वाले बादल धरती पर दूर नीचे तक आ जाते हैं। इसी प्रकार सज्जन धन-सम्पत्ति मिलने पर भी घमण्ड नहीं करते। परोपकार करने बाली आत्माओं का ऐसा ही स्वभाव होता है। (७१) भार फलें दा बददा जिन्ना, बूटे उन्ने सुकदे न, जिन्ने भारे हुन्दें बद्दल उन्ने नीमें ढुकदे न । धन-सुन्ने दा इस्सै चाली सज्जन मान निं करदे न, पर-स्वारथ दे सीतल झरणे कदें बी नइयों सुकदे न ॥ कान ज्ञान-श्रवण से ही शोभा पाते हैं, कुण्डलों से नहीं; हाथ की शोभा दान देने से है, सुवर्ण-कंकणों से नहीं । इसी तरह मनुष्य का शरीर दुखी जनों की सेवा से ही शोभा पाता है, चन्दन-लेप से नहीं । (७२) कुण्डलें ते काण्टें कन्ने, कन्नें दी निं शोभा हुन्दी, गुरुएं दी सिक्खेआ गै कन्नेंगी सजान्दी ऐ । कङ्गनें ते कड़ें कन्ने, हत्थें दी निं शोभा हुन्दी, हत्थें आली शोभा दानशीलता बदान्दी ऐ । चन्दना दे लेपें कन्नें अंगें दी निं शोभा हुन्दी, प्राणियें दी सेवा शोभा अंगेंदी बनान्दी ऐ ॥
पद्माकरं दिनकरो विकचं करोति, चन्द्रो विकासयति कैरव-चक्रवालम् ।
नाभ्यथितो जलधरो ऽपि जल ददाति, सन्तः स्वयं पर-हिते विहिताभियोगः ।।७३।।
सूर्य्य कमलों को खिला देता है । चान्द कमलिनियों के समूह को विकसित करता है । बादल बिना किसी की याचना के ही जल बरसाते हैं। सन्त अपने स्वभाव से ही दूसरों की भलाई के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं ।।
(७३)
सूरजा दी लो नित्त कमल खड़ाई जन्दी,
चाननी तलाए-सरें, नापेंगी हसाई जन्दी ।
बिना मंगे पानी देना, बद्दलें दी रीत ऐ,
दुए दी भलाई कन्ने सज्जनें परीत ऐ ॥
एते सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये, सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये ।
ते ऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये, ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के (?) न जानीमहे ।। १४।॥
जो लोग अपनी स्वार्थ-भावना को छोड़ कर दूसरों का हित करते हैं वे सच्चे सत्पुरुष कहाते हैं। जो अपने स्वार्थ को हानि पहुंचाए बिना दूसरों के कामों में सहायक होते है वे भी साधा-रणतया भले लोग कहाते हैं। जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हित को नष्ट करते हैं वे मनुष्य रूप में पिशाच हैं। लेकिन जो बिना स्वार्थ-सिद्धि के, अकारण ही, दूसरों को हानि पहुंचाते हैं - उन्हें क्या कहें ?
(७४)
स्वारथ-भाव बसारी जेके नेकी-भाव नभान्दे न,
उयै उत्तम मुनस रव्वान्दे, सच्चा नाम कमान्दे न ।
अपने स्वारथ कन्ने लेइयै, हित दुएं दा करदे जो,
धरती उप्पर ओ बी मानु नाम भलें दा पान्दे न ।
जड़े मना दी खुशियें खातर दुएं दा मन कोन्दे न,
डंगदे छात्ती पुजा आली, राखस रूप खोआन्दे न ।
बिन स्वारथ, बिन कारण जेके कण्डे बनियै डंगदे न,
दस्सो लोको ! पापी मानु ओ के नाम धरान्दे न ?
पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्य निगूहति, गुणान् प्रकटी करोति ।
आपद्गत च न जहाति, ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥७५॥
पाप (के कामों) से हटा कर हित के कामों में जो लगाता है, रहस्य की बातों को छिपा कर (मित्र के) गुणों को प्रगट करता है, विपत्ति के समय छोड़ नहीं जाता तथा ज़रूरत पड़ने पर हर तरह की सहायता देता है - सन्त लोग, सच्चे मित्र की यही निशानियां बतलाते हैं । (७४) जड़ा पायें थमां मोड़े, चंगे कम्में कन्ने जोड़े, दोस मना बिच रवखै, गुण हस्सी हस्सी दस्सै । घनी औख जदू पवै तदू कन्नें कन्नें रवै, लोड़ बनै जदू भारी, जिसी भाखी ओदी कारी । सच्चे मित्तरा दी शान, इयै उन्दी ऐ पशान, सैन्त सज्जन सुजान भेद खोलियै सुनान ॥ .
क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिला, क्षीरोत्तापमवेक्ष्य तेन पयसाप्यात्मा कृशानौ हुतः ।
गन्तुः पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं, युक्त तेन जलेन शाम्यति, सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी ।।७६।।
दूध ने अपने में मिले हुए पानी को अपने सभी गुण दे दिए थे. इसी तरह उस पानी ने (आग पर रक्खे हुए) दूध के सन्ताप को देख कर आग के ताप में पहले अपने को जला डाला । मित्र (जल) की यह विपत्ति देख कर दूध आग पर आक्रमण करने के लिए उबाल लेने लगा लेकिन पानी (का छींटा) मिल जाने से वह उसी क्षण शान्त हो गया । अच्छे लोगों की मैत्री ऐसी ही होती है । (७६) दुद्दा बिच पानिया दा मेल जदू हुन्दा ऐ गुण देइये दुद्द उसी गलै कन्ने लाई लै। अग्गी पर औन्दे हुन्दी कठन परीक्षा, सेक जरै आफू पानी, दुद्धागी बचाई है। दुख दिक्खी मित्तरा दा उब्बली खड़ोऐ दुद्द, मिलदे गै पानी, ठण्ड कालजै बसाई लै । सज्जना दी मित्तरी दा इयै ते गुआड़ ऐ, प्राणें थमां बद्द दिक्खो मित्तरी बनाई लै ।।
इतः स्वपिति केशवः कुलमितस्तदीयद्विषा- मितश्व शरणार्थिनः शिखरिणां गणाः शेरते ।
इतोऽपि बडवानलः सह समस्त-संवर्तकै- रहो विततमूजितं भरसहं च सिन्धोर्वपुः ॥७७॥
इधर विष्णु सो रहे हैं; एक तरफ उनके शत्रुओं (राक्षसों) का समूह रहता है। इस ओर शरण में आए हुए पर्वतों की कितारें विराज रही हैं। एक तरफ प्रलयकाल की अग्नियों के साथ बडवानल (समुद्र की आग) ने घेर कर रखा है । आश्चर्य्य है, सागर का शरीर कितना विशाल, कितना बलयुत और कितना व्यापक है। (७७) इक पासै शेष-सेजा विशनू बराजे दे, दुऐ पासै बैरियें दे राखसें दे डेरे न । थाएं थाएं प्हाड़ ओदी पक्खपायां सज्जेदे, केई थार ओदे, ओदी अग्गू ने गै घेरे न । सागरा दा चित्त किन्ना डू ंगा ते बशाल ऐ, चङ्ग मन्दे सब्वै उन्ने गोदै च सजेरे न ॥
जातः कूर्मः स एकः पृथुभुवनभरायापितं येन पृष्ठं, श्लाध्यं जन्म ध्रुवस्य भ्रमति नियमितं यत्र तेजस्वि-चक्रम् ।
संजात-व्यर्थ पक्षाः परहितकरणे नोपरिष्ठान्न चाधो, ब्रह्माण्डोदु बरांतर्गतशकवदपरे जंतवो जातनष्टाः ।॥७८॥
इस कच्छुए का ही जन्म सफल है जिसने व्यापक पृथ्वी का भार उठाने के लिए अपनी पीठ अर्पित कर रखी है। इस ध्रुव नक्षत्र का जन्म भी धन्य है जिस के चारों ओर समस्त नक्षत्र मण्डल नियम के साथ घूमता रहता है। परन्तु जो प्राणी दूसरों की हित करने में असमर्थ हैं तथा विश्व में (त्रिशंकु की तरह) अधर में लटक रहे हैं वे इस ब्रह्माण्ड रूपी उदुम्बर के बीच में भरे हुए मानों लघु कृमियों के तुल्य हैं। ( ૭= ) शोभा आला मान जां ते कछुएगी थोआ ऐ, पृथ्थिया दा भार जिन्ने पिट्टी पर बन्ने दा । धन्न धन्न आखो जां फी उस ध्रुव तारेगी, ध्रुव रेइयै तारें आला घेरा जिन्ने थम्मे दा । भ्रिग उन्दा जीन परस्त्रारथ निं भाखा जिनें, पैर जिन्दा उप्पर नां खल्ल कुतै जम्मे दौनें दे मंझाटै ओ ते दुनिया दे कीड़े न, रुभ्बला दे कीड़ें आङ्ग जीन नइयों कम्मे दा ।। दा ।
तृष्णां छिन्दि भज क्षमां जहि मदं पापे रति मा कृथाः ।
सत्यं ब्रह्मनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम् ।।
मान्यान्मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रख्यापय स्वान्गुणान् ।
कीर्ति पालय दुःखिते कुरु दयामेतत् सतां चेष्टितम् ॥७६।॥
हे मन ! तृष्णा को त्याग दे. सहनशील बन और पाप में रुचि न कर । सत्य बोल, भले लोगों का अनुसरण कर तथा विद्वानों की सेवा कर । माननीय बड़ों का मान कर, शत्रुओं से भी कोमल व्यवहार कर तथा गुणों का विकास कर । कीर्ति की रक्षा कर, दुखियों पर दया कर क्योंकि भले लोगों का आचरण ऐसा ही होता है । (७६) मना ! लालसा गी भन्न, गण्ड पापा दी निं बन्न सच्च चित्ता च बसाई लै । पूजा गुनियें दी कर, पिच्छे भलें दै गै चल, प्रीत सब्बनें ने पाई लै । जस्स-चाननी बछा, दुखी गलै कन्ने ला, नाम उज्जल कमाई लै. । चंगे लोकें दी नशानी, मिट्टी मिसरी गलानी, भाव सेवा अपनाई लै ।।
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः त्रिभुवनमुपकारश्र णिभिः प्रीणयन्तः ।
परगुणपरमाणुन्पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकमन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ।।८०।।
जिनके मन वचन और शरीर में पवित्रता का अमृत भरा हुआ है, जो अपने भले कामों से ससार को सदा प्रसन्न रखते हैं, जो दूसरों के सरसों जैसे छोटे छोटे गुणों को भी पहाड़ बना कर प्रसिद्ध करते हैं, अपने मन में प्रसन्न रहने वाले ऐसे सन्त मानव, इस जगत में कितने होंगे ? (८०) मन जिन्दा शुद्ध, बोली मिट्टी, देह साफ ऐ, कम्म जिन्दे भले इस पुलागी सजान्दे न । मित्तिया गी मान सुन्ने चान्दिया दा देने आले हैन किन्ने मानु ? जड़े मान नेआ पान्दे न ।॥
किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा, यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव ।
मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण कङ्कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः ।॥५१॥
सोने के तथा चान्दी के उन पर्वतों (मेरु और कैलाश) का क्या बड़प्पन है, जिन पर उगे हुए वृक्ष साधारण वृक्ष ही बने रहते हैं ? हम तो उस मलयाचल को ही मान देते हैं जिस पर उगने वाले ककोल, नीम और कुटज जैसे साधारण वृक्ष भी चन्दन बन जाते हैं ।
( ८१ )
सुन्ने दा ओ मेरु परबत, चान्दी दा कैलाश,
बूटें दा पर रूप निं बदलन, के म्हैमा ऐ खास ?
धम्न सराओ मलयाचल गी, जेदे गुण परकास,
किक्कर, गरणे चन्दन बणदे, मिट्टी दिन्दे बास ।।
रत्नैः महार्घेस्तुतुपुर्न देवा, न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् ।
सुधां विना न प्रययुविरामं, न निश्चतार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥८२॥
देवता लोग (सागर से निकलने वाली) मोती-मुगों की दौलत पाकर ही सन्तुष्ट नहीं हो गए और न ही (वहां से निकलने वाले) भयंकर हालाहल विष को देख कर भयभीत हुए । उन्होंने (सागर-मंथन) के अपने प्रयत्नों को तब तक जारी रखा जब तक वे अमृत पाने में सफल नहीं हो गए। इसी तरह धीर लोग अपने निश्चय से कभी भी मुँह नहीं मोड़ते हैं।
( ८२ )
हीरे मोती दिक्खी चित्त देवतें दे कम्बे नईं,
बिस्स म्हौरा दिक्खी उन्दे हौसले बी सम्बे नईं,
सुधा रस पाए बिना, गैं पिच्छे दित्ती नई,
प्रण पाई बीर कदें, हार खाइयै जन्दे नई ।
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः, प्रारभ्य विघ्ननिहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नमु हुर्मुहुरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारब्धमुत्तमगुणा न परित्यजन्ति ।। ८३।।
नीच प्रकृति के लोग (कल्पित) विघ्नों के डर के कारण कभी कोई काम शुरू ही नहीं करते। मध्यम वृत्ति वाले लोग काम शुरू करते हैं परन्तु विघ्न आ पड़ने से भयभीत होकर उसे अधूरा ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम प्रकृति वाले सच्चे वीर, विघ्न-बाधाओं को पराजित करके अपने काम को पूरा कर लेते हैं।
( ८३ )
बिगनें थों डरी नीच, कम्म गै नई रम्बदे,
रम्बियै बी दुए डरी, मंझ छुड़ी जन्दे न ।
सुनस न उयै कम्म, तोड़ जो नबाई लैन,
बिगनें दे कुण्डे जिन्दें अग्गें मुड़ी जन्दे न ॥
क्वचित्पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः क्वचिच्छाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः ।
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो, मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम् ॥८४॥
चाहे पृथ्वी पर ही सोना पड़े, चाहे राजसी शय्या प्राप्त हो, चाहे साग पर ही निर्वाह करना पड़े या स्वादु व्यञ्जन उपलब्ध हों, चाहे फटी हुई कन्था (गुद्दड़ी) पहनने के लिए हो, या पवित्र पट्ट-वस्त्र मिलें, अपने काम की धुन में लगा हुआ मनस्त्री पुरुष सुख अथवा दुःख किसी की भी चिन्ता नहीं करता ।
( ८४ )
रेशमी ऐ सेज भाएं, पुर्जा भाएं सौना पवै,
स्वादले दरब्ब थोन, सुक्खा जां फी रौहना पवै,
पट्टादी पशाकी होऐ, गुद्दड़ी दा लाबा थोऐ,
सुख होऐ दुख होऐ, घाटा होऐ, बादा होऐ,
हत्थ लैता कम्म जिन्ने चिर होआ पूरा नई,
मानियेंगी इनें गल्लें खुशी नइयों, भूरा नई' ।।
निन्दन्तु नीति-निपुणा यदि वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् ।
श्रद्यव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा, न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ।।८५।।
नीति में चतुर मनुष्य चाहे निन्दा करें या स्तुति करें, लक्ष्मी अपनी इच्छा से आए या चली जाए. युग तक जीने का अवसर मिले चाहे आज ही शरीर छूट जाए, परन्तु धैर्य्यवान व्यक्ति न्याय के पथ से कभी भी विचलित नहीं होते । (८५) नां फुलदे अस्तुतियां सुनियै, नां निन्दा थों डरदे न । धन होऐ जां दूरा चमकै, चिन्ता मूल निं करदे न । मौत खड़ोती लब्धै अग्गें, जुग - जुग लम्मी होऐ बरेस । न्यां दी बत्त निं लुड़दे व्हादर, सुख थोऐ जां होऐ कलेस ॥
कदथितस्यापि हि धैर्य्यवृत्ते- र्न शक्यते धैर्यगुणः प्रमाष्टुम् ।
अधोमुखस्यापि कृतस्य वह, ने- धिः शिखा यान्ति कदाचिदेव ।।
धीर पुरुष घोर विपत्ति पड़ने पर भी कभी अपने धैर्य के गुण को नहीं छोड़ता । जलती हुई (लकड़ी की) आग को नीचे की ओर झुका देने पर भी उसकी लपटें कभी नीचे की ओर नहीं जातीं । ( ८६ ) लक्ख कसाले पौन करें पर बीरें दे मन डरदे नई । करो बसाठी उल्टी नीमी, भांबड़ उल्टे बलदे नई ।।
कान्ताकटाक्षविशिखा न लुनन्ति यस्य चित्तं न निर्दहति कोपकृशानुतापः ।
कर्षन्ति भूरिविषयाश्च न लोभपाशै - र्लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः ।। ८७।।
जिसके चित्त को न तो सुन्दर कामिनी के कटाक्षों के पैने तीर ही घायल कर पाते हैं, न क्रोध रूपी अग्नि का सन्ताप ही जलाता है, जिसे सांसारिक भोग अपने लोभ-पाशों में नहीं बान्ध सकते वह धीर पुरुष सारे संसार को जीत लेता है । (८७) गोरियें दी नजरी दे तीर दिया मारा अग्गें, रोआ आले ङारें दिया तपीदी कटारा अग्गें, लालसा जगाने आले रूपा दे संगारा अग्गें, गीतें कम्ने गुञ्जदिया, भोगें दी बहारा अग्गें, जड़ा धीर-चित्त नां गै नौन्दा, नां बनोन्दा ऐ, लोकें परलोकें उयै सूरमा गनोन्दा ऐ ॥
एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम् ।
क्रियते भास्करेणैव परिस्फुरिततेजसा ।।८८।।
छिन्नोऽपि रोहति तरुः क्षीणोऽप्युपचीयते पुनश्चन्द्रः ।
इति विसृशन्तः सन्तः सन्तप्यन्ते न विप्लुता लोकेषु ॥८६॥
सूर्य्य की तरह चारों ओर अपने तेज को फैलाने वाला एक भी वीर पुरुष सारे संसार को अपने वश में कर सकता है । शाखाएं काट दिए जाने पर भी वृक्ष दुबारा हरा भरा हो जाता है, चान्द क्षीण होकर दुबारा भर जाता है । इन्हीं बातों को मन में रखकर भले लोग ससार में विपत्ति पड़ने पर भी घबराते नहीं । ( ८८ ) सच्चा सूरा कल्ला भामें, दुनिया गी ओ हरान्दा ऐ, सूरज कल्ला हसदा औन्दा, न्हेरे अग्गें लान्दा ऐ ।। (८६) घटदा जियां चन्न बरोबर उस्सै चाली बददा ऐ, छिम्बो छाङ्गो रुक्ख निं मरदे, पौंगर नमीं सजान्दे न । रोज सुनान्दी कुदरत कहानी, ज्ञानी सुनदे रौहन्दे न, इस्सै कारण विपदा पौन्दे बिन्द निं ओ घबरान्दे न ।।
वह्निस्तस्य जलायते, जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणात्, मेरुः स्वल्पशिलायते, मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते ।
व्यालो माल्य-गुणायते, विषरसः पीयूषवर्षायते, यस्याङ्ग ऽखिललोकवल्लभतरं शील समुन्मीलति ॥६०।।
जिस मनुष्य के शरीर में समस्त संसार का मन मोह लेने वाला शील निवास करता है, उस के सम्मुख आग भी जलमय हो जाती है, सागर छोटी नहर के समान हो जाता है, ऊँचा मेरु पर्वत छोटी सी शिला सदृश हो जाता है. सिंह हरिण जैसा दिखाई देता है, सर्प माला का गुण अपना लेता है और विष से अमृत टपकने लगता है। (६०) जिदै मन सील सुच्चा जोतियां जगान्दा ऐ, डारे ओदे अग्गें फुल्ल लाल बनी जन्दे न । सागर संकोचा कन्ने कूल जन बनी जा, व्हाड़ जियां टिव्बुएं दे थार बनी जन्दे न । पशुयें दा राजा शेर, मिरगा दा रूप धेरै, विस गंगा जल, सप्प हार बनी जन्दे न ।।
ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता, शौर्यस्य वाक्संयमः, • ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः ।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता, सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम् ।।६१॥
सुजनता ही धन-ऐश्वर्य की शोभा है वाणी का संयम वीरता की । शान्त स्वभाव, ज्ञान की शोभा बढ़ाता, है विद्या विनय से शोभा पाती है और धन की शोभा है सत्पात्र को दान देना । अक्रोध तपस्या की शोभा है और क्षमा बलवान की । धर्म की शोभा आडम्बर रहित होने में है और सभी गुणों का आधार-भूत गुण 'शील' सभी के लिए सर्वोत्तम आभूषण है। (६१) संजम बाणी उप्पर जिसदा, उयै बीर नराला ऐ, भलीमानसी शोभा साथी, बड्डें दी धनवानें दी । बिना पखण्डें धरम बी सज्जै, धन पुन्नें ते दाने नैं, ह्रीमी सच्ची शोभा साथी, तप विद्या ते ज्ञानै दी। क्रोध लोभ ते मोह, हंकारी, जिसदे अग्गें हारे न, 'सील' गुणें दी शोभा, कन्ने कूञ्जी एस खजाने दी ।।
(भाग्य प्रशंसा)
नेता यस्य बृहस्पतिः प्रहरणं वज्र, सुराः सेवकाः, स्वर्गो दुर्गमनुग्रहः खलु हरेरैरावतो वाहनः ।
इत्याश्चर्यबलान्वितो ऽपि बलभिद्भग्नः परैः संगरे, तदृव्यक्त ननु दैवमेव शरणं धिग्धिग्वृथा पौरुषम् ॥६२॥
बृहस्पति जैसे जिसके पथ-प्रदर्शक हैं, वज्ज्र अस्त्र है तथा देववृन्द जिसके सैनिक हैं, स्वर्ग जैसा जिसका किला है, विष्णु जिस पर दयालु हैं, ऐरावत हाथी जिसका वाहन है- इस प्रकार की असाधारण शक्ति वाला देवराज इन्द्र भी युद्ध में शत्रुओं से पराजित हो गया । स्पष्ट है कि भाग्य बड़ा बलवान है और उसके आगे उद्यम तथा शक्ति व्यर्थ हैं। (६२) देवगुरु न्हे गुरु हे जिसदे, बज्जर हा हथ्यार, देवता जिसदे बीर सपाई, सुरग हा दुरग द्वार । ऐरावत न्हे बाहन जिसदे, विश्णु हरदम संग, ऐसा इन्दर राजा, जेदा सुन्ने दा घर-बार । जोर ते हीले कम्म नि औन्दे, भाग बड़े बलोआन, दैतें कोला खानी पेई गेई तद्द उसगी हार ।।
भग्नाशस्य करण्डपिण्डिततनोम्नेन्द्रिस्य क्षुधा, कृत्वाऽऽखुविवरं स्वयं निपतितो नक्त मुखे भोगिनः ।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा, लोकाः पश्यत दैवमेव हि नृणां वृद्धौ क्षये कारणम् ।।६३।।
(करण्ड) पिटारी में बन्द पड़ा हुआ (कोई) सांप (भोगी) भूख से दुर्बल-शिथिल होकर निराश हो गया था। रात को एक चूहा उस पिटारी में छेद करके स्वयं उसके मुख में आ पड़ा । उस चूहे का मांस खाकर तृप्त हुआ वह सांप उसी छेद से बाहिर निकल गया । ऐ लोगो, देख लो, विधाता ही प्राणियों की विपति और उन्नति (मुक्ति) का हेतु बनता है । ( ६३ ) सप्प हा पटारुए च कैद केइयें दिनें दा, चुक्खा कन्ने अंग अंग ढिल्ला होई गेदा हा । रातीं बेल्लै चुआ इक मोरी करी लंगी आया, सप्पा दे नसीब, मास उसी थोई गेदा हा । मोरी ही त्यार, ओदे गितै गै से लंगी गेआ, भागें दे तमासे दिक्खो, सप्प रोई पेदा हा ।।
खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः संतापिते मस्तके, गच्छन् देशमनातपं द्रुतगतिस्तालस्य मूलं गतः ।
तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः, प्रायो गच्छति यत्र दैवहतकस्तत्रैव यान्त्यापदः ॥६४॥
एक गञ्जा पुरुष गर्मी की ऋतु में सूर्य की किरणों से, सिर जलने पर, जल्दी जल्दी किसी छायादार जगह पहुंचने की इच्छा से ताड़ वृक्ष के नीचे जाकर खड़ा हो गया । परन्तु दुर्भाग्य ! वहां भी उस वृक्ष से एक भारी फल गिरने से उसके सिर पर एक जोर का आघात लगा । बेचारा अभागा मनुष्य जहां भी जाता है—विपत्तियां वहीं उसके साथ जाती हैं । (२४) गञ्जा इक मानु खौरी धुप्पा दा डराए दा, छां दिक्खी तौला तौला छामां जाई पुज्जा ऐ । खोपे दा हा रुक्ख, जिदे खल्ल बैठा हफे दा, फल पेआ सिद्दा सिरा पर, सिर सुज्जा ऐ । दुख मन्दे भागें आले कन्नें कन्ने जन्दे सदा, भागें दी ए मार, एदा दा बड़ा गुज्जा ऐ ॥
पत्रं नैव करीरविटपे दोषो वसन्तस्य कि, नालूकोऽप्यवलोकयते यदि दिवा सूर्य्यस्य कि दूषणं ? धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य कि दूषणं यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुः कः क्षमः ।॥६५।।
यदि (बसन्त ऋतु में भी) करीर पत्र-हीन रहे तो उस में बसन्त का क्या दोष है ? यदि उल्लू दिन के प्रकाश में नहीं देख सकता तो उसके लिए सूर्य्य को दोषी कैसे बनाया जाए ? यदि बादल बरसने पर भी चातक प्यासा ही रहता है तो मेघ में क्या बुराई है ? विधाता ने माथे पर जो लिख दिया है उसे कौन मिटा सकता है ? (२५) नंगी रवै जे करीर — बिना पोंगरा फकीर, मन्दी भागें दी लकीर—रुत व्हारा दी ते रानी ऐ । दिनें उल्लूगी निं लब्बै — लो मनागी निं फब्बै, पर आखदे न सब्बै — लो बड़ी मनभानी ऐ । घटा बरै जेल्लै गास — ग्वै चातक दोआस, इस्सै धरती दी आस—झड़ी कियां 'जलीजानी' ऐ। पक्की भागें दी लकीर — करै राजा ते फकीर, एदी बड़ी डू ंगी सीर—कियां कुसै ने मसानी ऐ ?
कर्मायतं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।
तथापि सुधिया भाव्यं सुविचार्येव कुर्वता ॥६६।।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुर्य कृत्वा नावसीदति ॥६७॥
चाहे सभी तरह के फल कर्म के अधीन होते हैं, और बुद्धि भी कर्म के ही अनुसार कार्य्य करती है फिर भी सयाने लोग सदा सोच-विचार कर ही काम करते हैं ।। आलस्य मनुष्य के शरीर में बसने वाला उसका भयंकरतम शत्रु है । हिम्मत और परिश्रम के समान दूसरा कोई बन्धु नहीं । परिश्रम करने से मनुष्य कभी दुखी नहीं रहता । करमें दे धीन भामें मानुयें दे सुख-दुख, करमें दे धीन ओदी बुद्धि - चतराई ऐ । बुद्धिमान् मानु फी बी सोची ते बचारी लैन्दा, कुत कम्मा हानी ऐ ते कैदे च भलाई ऐ ।॥६६॥ आलस गै मानुयें दा सिरमौर बैरी सदा, जड़ा ओदे चित्ता बिच आसन जमाई लै । इस्सै चाली उद्दमा दे तुल्ल कोई साथ नईं, जिदे जोरें मानु औखे कम्म बी बनाई लै ।॥६७॥
गुणवदगुणवद्वा कुर्वता कार्यमादौ परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन ।
अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते - र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ।।१८।।
अच्छा या बुरा काम करने से पहले सयाने लोगों को उसके फल पर विचार कर लेना उचित है । अन्यथा बिना विचारे, उतावलेपन में किए गए कामों का फल मृत्यु-पर्यन्त शूल बनकर हृदय में चुभता रहता है । (८) चंगा-माड़ा फल के होना सज्जन सोची-समझी लै, नासमझी ते का (ह)ली दे ओ कम्म कदें नई रम्बदे न । बिना बचारे तौले-तौले कम्म जड़ा कोई करदा ऐ, मरने तोड़ी भूरे उसदे कण्डे बनिये डंगदे न ॥
या साधूश्च खलान्करोति विदुषो मूर्खान्हितान्द्व षिणः प्रत्यक्षं कुरुते परोक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् ।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तु फलं वाञ्छितं हे साधो व्यसनैर्गु णेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः ॥६६॥
ऐ भले लोगो, मनवांछित फल पाने के लिए उस सत्क्रिया (उद्यम) रूपी देवता की अराधना करो जिसके प्रभाव से दुष्ट भी साधु हो जाते हैं, मूर्ख विद्वान् हो जाते हैं, छिपे हुए रहस्य सम्मुख आ जाते हैं और विष अमृत में बदल जाता है। (उद्यम रहित) बड़े बड़े गुणों को प्राप्त करने के लिए यत्न करना व्यर्थ है ।
(४४)
जिदा रस लुच्चड़ेंगी साध करी दिन्दा ऐ,
मूड़ जेदे करी धन बिद्या दा पाई जान ।
भेद अनदिक्खे जिदे अग्गें खुल्ली जन्दे सब,
गुण जिदे म्हौरेगी बी सुधा गै बनाई जान ।
भले लोको उद्दमागी देवता बनाओ तुस,
जिदी किरपा'नै फल सारे हत्थ आई जान ।
उद्दमा दे बाजू गुण सुक्के-सड़े तीले न,
उद्दमा दे बाजू गुण गुणियेंगी खाई जान ।
स्थाल्यां बैडूर्यमय्यां पचति स लशुनं, चन्दनैरिंधनोद्यैः ।
सौवर्णैर्लाङ्गलात्रै बिलिखति वसुधामर्क-मूलस्य होतोः ।।
छित्त्वा कपूर्रखंडान्वृतिमिह कुरुते कोद्रवाणां समंतात् ।
प्राप्येमां कर्मभूमि न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः ॥१००।।
जो अभागा व्यक्ति इस कर्म-भूमि (ससार) में जन्म लेकर भी परिश्रम रूपी तप नहीं करता वह मानो चन्दन को साधारण लकड़ियों की तरह जलाकर मुंगों की बनी हुई पतीली में लहसुन पकाने जैसी मूर्खता करता है, सोने के हल से जमीन को गहरा खोद कर आक की जड़े निकालने का जतन करता है या फिर व.पूर-वृक्ष को खण्ड २ करके जंगली चावलों की रक्षा के हेतु बाड़ लगाता है। (अर्थात् आलस्य में रहकर अमूल्य मानवदेह को व्यर्थ नष्ट कर देता है ।)
(१००)
मु'गें दी पतीली बिच थोम जियां सुन्नै ओ,
चन्दन बसाठियें दे तुल्ल चुल्ली लान्दा ऐ।
सुन्ने दिया हल्ला कन्ने पुञ जियां पुट्टि पुट्टि,
अक्का दियें पौंड़ें गितें परसे बगान्दा ऐ।
बड्डियै कपूर बूटे, टाल्लियें गो जोड़ी जोड़ी,
कोदरे दी राखी गितै बाड़ां ओ बनान्दा ऐ।
जग्गा बिच उद्दमा दी म्हानता निं जानी जिन्ने,
मूढ़ जड़ा उद्दद्मा दा तप निं कमान्दा ऐ ॥
नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगा विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मकफलदः ।
फलं कर्माधीनं किममरगणैः किञ्च विधिना नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ।।१०१।।
हम देवों के आगे सिर क्यों झुकाएं ? वे तो स्वयं विधाता के आगे गिड़गिड़ाते हैं। विधाता भी किस कारण मान्य हो ? वह तो हमारे किए हुए कर्मों का ही निश्चित फल देता है फल तो वस्तुतः हमारे अपने कर्मों के अधीन रहता है- उस देवताओं की क्या महत्ता और विधि का क्या हाथ है ? हम त। उन कर्मों को ही नमस्कार करते हैं जिन पर विधाता का भी प्रभाव नहीं होता । (१०१) देवी-देवतें दा मानु डर-भौ मन्नै की ? विद्दमाता अग्गे कैसी मत्थेंगी झकान्दे ओ ? थोना जदू अपने गै कम्में दा ऐ फल थोना, सुरगा दे देवतेंगी फिरी की मनान्दे ओ ? उद्दम कमाओ, चित्त उद्दमा च लाओ तुस, उद्दमा गी भागें कोला लौका की बनान्दे ओ ? उद्दमा गी देवतेंदी बिन्द बी म्हताजी नईं, उद्दमा दी म्हानंता गी फिरी की घटान्दे ओ ?