नसरी नज़्म (उर्दू)

Ghazals
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कूफ़ा के उन बदनसीब लोगों के नाम

ऐ कूफ़ा के बदनसीब लोगो!
हज़रत इमाम हुसैन के हम-असरो!
वक्त के गहरे बेकराँ समंदर में
इतिहास के बे-लिहाज़ मछरे के
जाल में फंसे हुए तुम लोग,
युगों-युगों से तड़प रहे हो,
युगों-युगो तक तड़पते रहोगे!
निजात तुम्हें न मिल सकेगी,
मौत को भी यूं ही तरसते रहोगे सदियों तक!
वक्त के गहरे, बे कराँ समंदर में!

× . × . ×

अपनी औलादों गी हकारत-भरी नज़रें
नश्तर की तरह चुभती रहेंगी तुम्हारे सीनों में,
कूफ़ा के मासूम लोगों की बद-दुआएं
झुलसाती रहेंगी तुम्हारी बे-वफ़ाइयों को,
क्यों के...
तुम्हीं ने उसे आने की दावतें दी थीं,
तुम्हीं ने लिखे थे वो दर्जनों ख़त-
जिनमें लिखा था तुम ने-
के यहाँ अब फल पक गए हैं-
ज़मीन हरी-भरी हो गई है,
नहरें उबल पड़ी हैं।
आप आएंगे तो अपने-आप को यहां
अपने अकीदतमंद सिपाहियों के लश्कर में पाएंगे!
तुम्हीं ने तो भेजे थे उसको,
इसरार भरे ख़त इतने!
ताके, अगर तुम किन्हीं मसलहतों के ज़ेरे असर
अपनी बात से फिर जाओ,