तो तुम्हारे उन बुज़दिल ज़मीरों को
उन ख़तों का दिखा सके दर्पण।
लेकिन तुम तो बातिल के हाथों
बेच बैठे थे ज़मीर अपने
ऐ कूफ़ा के बद-बख़्त लोगो!
वक़्त के खारे समंदर में
इतिहास के मछेरे के जाल में फंस कर
तुम न जाने कब तक तड़पते रहोगे यूँ ही।
इतिहास का मछेरा तुम्हें
अपने इस जाल से छूटने नहीं देगा,
और वक़्त के समंदर का यह खारा पानी
तुम्हें मरने नहीं देगा।
क्योंकि तुमने
ईमान की गर्दन लहुलुहान की है,
सच से बे-वफ़ाई की है
जन्नत के सदा-बहार फूलों का
घोड़ों के सुमों के नीचे रौंधा है तुमने।
ऐ कूफ़ा के बद-नसीब रहबरो राहज़नो।
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मियां डीडो
किस रिश्ते इच बन्नी लैते,
दर्दमंद तूं लोक नमाने ?
जि'नें तुगी नेईं कदै बी दिक्खेआ,
जि'नें नेईं दिक्खे जौहर तेरे।
सिर्फ सुनी ऐ, कहानी तेरी
पढ़ी कुत्ते कोई लिखत अधूरी।
की एह तेरे परस्तार न?
की एह तेरे पर गौहे करदे न?
- इस कविता दे सिरलेखै उप्पर लोहके रक्खरें च एह पंगती लिखी दी ही-डुग्गर दे लोक नायक, गुरीला
र मियां डीडो दी जयंती पर